
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के भारत-अमेरिका ट्रेड डील के बड़े दावे के ठीक एक दिन बाद रूस ने चुप्पी तोड़ी है। मंगलवार को क्रेमलिन ने साफ कहा कि भारत की ओर से रूसी तेल खरीद बंद करने को लेकर कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है।
यानी डील वॉशिंगटन में हुई, लेकिन मॉस्को तक खबर अभी पहुंची ही नहीं।
क्रेमलिन का सीधा संदेश
न्यूज़ एजेंसी Reuters के मुताबिक, क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा, “भारत हमारे लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है और हम इस साझेदारी को और मजबूत करने का इरादा रखते हैं।”
मतलब साफ है तेल पर चर्चा हो सकती है, लेकिन दोस्ती पर सवाल नहीं।
ट्रंप का बड़ा दावा क्या था?
डोनाल्ड ट्रंप ने ऐलान किया था कि अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया है। इसके बदले भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा। भारत अब अमेरिका और वेनेजुएला से तेल खरीदेगा। लेकिन इस पूरे दावे पर भारत सरकार की तरफ से अब तक कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
भारत की तेल मजबूरी भी समझिए
भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 90% कच्चा तेल आयात करता है। इसमें लगभग 35% तेल रूस से आता है। रूसी तेल अब तक डिस्काउंटेड रेट पर मिलता रहा है। यानी फैसला सिर्फ राजनीतिक नहीं, इकनॉमिक और टेक्निकल भी है।
अमेरिका को दिक्कत क्यों?
अमेरिका का आरोप है कि भारत द्वारा रूसी तेल खरीदने से रूस को यूक्रेन युद्ध में आर्थिक मदद मिल रही है। इसी वजह से अमेरिका ने पहले 25% अतिरिक्त पेनल्टी टैरिफ लगाया। फिर बातचीत के बाद उसे घटाकर 18% करने का ऐलान किया। लेकिन शर्तें कागज पर हैं, ग्राउंड पर तस्वीर अभी धुंधली है।

भारत-रूस दोस्ती: सिर्फ तेल से बड़ी
भारत और रूस की दोस्ती कोई नई नहीं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में रूस भारत के साथ खड़ा रहा। जब कई पश्चिमी देशों ने दूरी बनाई, रूस ने साथ नहीं छोड़ा
यही वजह है कि भारत हमेशा Strategic Balance की भाषा बोलता रहा है ना पूरी तरह किसी के पाले में, ना किसी से दुश्मनी।
ट्रंप कह रहे हैं—“तेल बंद”।
रूस कह रहा है—“हमें बताया किसने?”
भारत कह रहा है—अब देखते हैं…
डिप्लोमेसी में यही होता है पहले बयान, फिर संतुलन, और अंत में धीमी लेकिन सोची-समझी चाल।
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