नई दिल्ली: दशहरा पूरे देश में बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसे मनाने का तरीका हर जगह एक जैसा नहीं है। उत्तर भारत में जहां रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतलों का दहन किया जाता है, वहीं मैसूर में देवी की भव्य शाही सवारी निकलती है। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में स्थानीय देवी-देवताओं का जमावड़ा लगता है, जबकि छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा करीब 75 दिनों तक चलने वाले उत्सव के रूप में मनाया जाता है। देश के अलग-अलग हिस्सों की ये परंपराएं दशहरे को खास पहचान देती हैं।
उत्तर भारत में रावण दहन की परंपरा
उत्तर भारत के ज्यादातर राज्यों में दशहरा भगवान राम की कथा से जुड़ा है। पर्व से करीब नौ दिन पहले रामलीला का आयोजन शुरू हो जाता है। विजयादशमी के दिन रावण, मेघनाद और कुंभकरण के विशाल पुतलों का दहन किया जाता है। इस परंपरा के जरिए बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है।
पश्चिम बंगाल में सिंदूर खेला और मां दुर्गा की विदाई
पश्चिम बंगाल में दशहरे को विजयादशमी के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन मां दुर्गा ने दस दिनों तक चले युद्ध के बाद महिषासुर का वध किया था।
इस अवसर पर महिलाएं सिंदूर खेला की रस्म निभाती हैं। वे एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर मां दुर्गा से आशीर्वाद मांगती हैं। विजयादशमी के दिन मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन भी किया जाता है, जिसके साथ दुर्गा पूजा उत्सव का समापन होता है।
कुल्लू में जुटते हैं 200 से ज्यादा देवी-देवता
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरा मनाने की परंपरा बाकी जगहों से अलग है। यहां उत्सव की शुरुआत भगवान रघुनाथ को लकड़ी के रथ में बैठाकर ढालपुर मैदान लाने के साथ होती है।
इसके बाद पालकियों में सवार होकर 200 से ज्यादा स्थानीय और ग्राम देवता उत्सव में शामिल होने पहुंचते हैं। एक सप्ताह तक चलने वाला यह आयोजन धार्मिक आस्था और स्थानीय संस्कृति का अनूठा संगम माना जाता है।
मैसूर में देवी चामुंडेश्वरी की शाही सवारी
कर्नाटक के मैसूर में दशहरा दस दिनों तक मनाया जाता है। यह उत्सव देवी चामुंडेश्वरी को समर्पित है और अपनी शाही परंपरा के लिए प्रसिद्ध है।
यहां की सबसे बड़ी खासियत जंबू सवारी है। इस दौरान सजे-धजे हाथी पर रखे सोने के हौदे में देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा विराजमान होती है। इसके साथ भव्य जुलूस निकाला जाता है, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में सोना पत्ती की रस्म
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में दशहरे के अवसर पर सोना पत्ती की परंपरा निभाई जाती है। इस दिन शमी के पेड़ की पूजा की जाती है और उसकी पत्तियां एक-दूसरे को प्रतीकात्मक रूप से सोना मानकर दी जाती हैं। यह रस्म आपसी सद्भाव और शुभकामनाओं से जुड़ी है।
बस्तर में 75 दिनों तक चलता है दशहरा, नहीं होता रावण दहन
छत्तीसगढ़ के बस्तर में दशहरा देश के सबसे अलग उत्सवों में गिना जाता है। यहां यह पर्व करीब 75 दिनों तक चलता है, लेकिन रावण दहन नहीं किया जाता। इस परंपरा के पीछे क्षेत्र की लगभग 600 साल पुरानी धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताएं जुड़ी हैं।
बस्तर का दशहरा मुख्य रूप से मां दंतेश्वरी और स्थानीय देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना को समर्पित है। उत्सव के दौरान रथ यात्राएं निकाली जाती हैं और आदिवासी समुदायों की पारंपरिक रीति-रिवाजों की झलक देखने को मिलती है। इस तरह बस्तर में दशहरा भगवान राम और रावण की कथा के बजाय स्थानीय देवी-देवताओं और क्षेत्रीय संस्कृति के इर्द-गिर्द मनाया जाता है।
