
उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में उस वक्त राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ गया, जब बीजेपी विधायक ज्ञान तिवारी अपने समर्थकों के साथ सीधे रामपुर मथुरा थाने पहुंच गए। कुर्सी छोड़कर ज़मीन पर बैठना यह तस्वीर अपने आप में संदेश दे रही थी। आरोप साफ था थाना प्रभारी, दीवान और एक सिपाही का व्यवहार जनता के प्रति “असंतोष और डर” पैदा कर रहा है।
विधायक का कहना था कि जब तक जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होती, तब तक उनका विरोध जारी रहेगा।
थाने में नारे, प्रशासन में हलचल
धरने की खबर मिलते ही प्रशासनिक अमला एक्टिव मोड में आ गया। सीओ वेद प्रकाश मौके पर पहुंचे और निष्पक्ष जांच का भरोसा दिलाया।करीब एक घंटे चली बातचीत के बाद धरना समाप्त हुआ, लेकिन विधायक ने साफ किया “यह विराम है, समापन नहीं।”
अगर कार्रवाई में देरी हुई तो आंदोलन दोबारा शुरू होगा।
सवाल सिर्फ शिकायत का नहीं, सिस्टम का है
पुलिस का पक्ष भी सामने आया। अधिकारियों ने कहा कि हर शिकायत पर कानूनी प्रक्रिया के तहत काम किया जाता है और किसी भी मामले को नजरअंदाज नहीं किया गया है।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता पक्ष के विधायक का अपनी ही सरकार में पुलिस के खिलाफ धरने पर बैठना प्रशासनिक तालमेल पर बड़ा सवाल है।

“जब सिस्टम से शिकायत हो, तो फाइल नहीं, धरना खुलता है।”
क्या यह स्थानीय नाराजगी है या बड़ा राजनीतिक संदेश? क्या यह जनता की आवाज़ है या संगठनात्मक असंतोष? क्या प्रशासनिक जवाबदेही की नई लाइन खींची जा रही है?
सीतापुर की यह घटना केवल एक थाने तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता और सिस्टम के रिश्ते की पड़ताल भी है।
धरना भले खत्म हो गया हो, लेकिन राजनीतिक असर जारी है। अब सबकी निगाह इस बात पर है कि जांच कितनी पारदर्शी और समयबद्ध होती है। लोकतंत्र में जब जनप्रतिनिधि सड़क पर उतरता है, तो संदेश सिर्फ प्रशासन को नहीं, पूरी व्यवस्था को जाता है।
South Block से Service Mode तक: सत्ता का नया पता ‘सेवा तीर्थ’
