ग्वालियर में महिला पेंटिंग से छेड़छाड़ – दीवार धुल गई, दिमाग कब धुलेगा?

जीशान हैदर
जीशान हैदर

मध्य प्रदेश के ग्वालियर में सार्वजनिक दीवार पर बनी महिला पेंटिंग के प्राइवेट पार्ट्स से छेड़छाड़ का मामला सामने आते ही प्रशासन हरकत में आया। समाधान?
पूरी दीवार को सफेद रंग से पुतवा दिया गया। अब सवाल ये नहीं है कि दीवार साफ हुई या नहीं, सवाल ये है—क्या सोच भी साफ हुई?

Art पर हमला या Mentality का एक्सपोज़?

जिस पेंटिंग का मकसद महिला सशक्तिकरण और सामाजिक संदेश देना था, उसी पर कुछ लोगों ने अपनी घटिया मानसिकता थोप दी।
यह कोई शरारत नहीं, यह symptom है— उस बीमारी का, जो समाज की सोच में गहराई तक फैली है।

दीवारें सफेद करने से अपराध नहीं मिटते, अपराधी सोच मिटाने से ही दीवारें सुरक्षित रहती हैं।

“क्या हमारी बेटियां सुरक्षित हैं?” – सबसे डरावना सवाल

आज हर मां-बाप के मन में एक ही सवाल गूंज रहा है- क्या हम यह सोच भी सकते हैं कि हमारी बेटी अकेले देर शाम बाहर हो और सुरक्षित भी?

अगर जवाब “शायद” या “नहीं” है, तो ये सिर्फ प्रशासन की नहीं, हम सबकी collective failure है।

प्रशासन का Action या Convenient Silence?

प्रशासन ने तुरंत सफेदी करवाई— Visual embarrassment हट गई Behavioral embarrassment जस की तस।

ना कोई public awareness, ना कोई मानसिकता पर चोट, बस white paint = temporary relief

सवाल पूछने वाला कोई नहीं कि ये हरकत करने वाला सोच कहां से लाया?

दीवारें नहीं, दिमाग पुतवाइए

अगर सफेदी ही समाधान है, तो हर गली, हर फोन स्क्रीन, हर सोशल मीडिया कमेंट सेक्शन सब पर सफेद रंग पोत दीजिए।

लेकिन सच ये है— Crime graffiti से नहीं, character से रोका जाता है।

Art Vandalism = Women Vandalism

जब किसी महिला की तस्वीर सुरक्षित नहीं, तो असल महिला कितनी सुरक्षित होगी?

यह घटना सिर्फ ग्वालियर की नहीं, यह उस भारत की है जहां “Respect Women” अक्सर सिर्फ पोस्टर स्लोगन बनकर रह जाता है।

Paint हटाओ, Prejudice हटाओ

दीवारें दोबारा पेंट हो जाएंगी, लेकिन अगर सोच नहीं बदली— तो अगली बार दीवार नहीं, कोई ज़िंदगी दाग़दार होगी।

अब वक्त है— सवाल पूछने का, सोच बदलने का और बेटियों के लिए सिर्फ कानून नहीं, culture सुरक्षित करने का।

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