
गोरखपुर की सुबह आम दिनों की तरह ही शुरू हुई थी. हल्की धूप, सन्नाटा, और कुछ लोग मॉर्निंग वॉक पर. लेकिन कुछ ही मिनटों में यह शांति चीखों में बदल गई.
पूर्व पार्षद राजकुमार चौहान… जो रोज की तरह टहलने निकले थे…उन्हें नहीं पता था कि आज रास्ते में चार साए उनका इंतजार कर रहे हैं. यह हमला अचानक नहीं था. यह इंतजार किया गया… प्लान किया गया… और बेरहमी से अंजाम दिया गया.
गोलियां, चाकू और 100 मीटर की जंग
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, हमलावरों ने उन्हें घेर लिया. पहले गोली चली… फिर चाकू चला… और फिर शुरू हुई एक इंसान की आखिरी लड़ाई. राजकुमार चौहान खून से लथपथ हालत में करीब 100 मीटर तक भागे. हर कदम पर जिंदगी फिसल रही थी…लेकिन शायद उम्मीद अभी भी जिंदा थी.
मगर हमलावर रुके नहीं. उन्होंने पीछा किया…और फिर दोबारा हमला किया. इस बार वार इतना गहरा था कि शरीर नहीं, सांसें हार गईं.
‘मरने का इंतजार’: हैवानियत का सबसे काला चेहरा
हमले के बाद जो हुआ… वह किसी भी इंसान को अंदर तक हिला सकता है. हमलावर मौके पर ही बैठे रहे. क्यों? ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि उनका शिकार अब उठ नहीं पाएगा. यह सिर्फ हत्या नहीं थी…यह एक ठंडी, सोची-समझी क्रूरता थी. जब यकीन हो गया कि सब खत्म हो चुका है…तभी वे वहां से निकले. जैसे कोई काम पूरा करके लौट रहा हो.

अस्पताल तक की दौड़… और आखिरी घोषणा
सूचना मिलते ही परिजन मौके पर पहुंचे. घबराहट, चीखें, उम्मीद… सब एक साथ दौड़ रहे थे. राजकुमार चौहान को तुरंत BRD मेडिकल कॉलेज ले जाया गया. लेकिन वहां डॉक्टरों ने वही कहा…जिससे हर कोई डर रहा था. “अब बहुत देर हो चुकी है.”
कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल
गोरखपुर… जो कभी शांति और सियासत का संतुलन माना जाता था…वह अब सवालों के घेरे में है. दिनदहाड़े, सार्वजनिक जगह पर, इतने सुनियोजित तरीके से हत्या…यह सिर्फ एक व्यक्ति की मौत नहीं है. यह सिस्टम के चेहरे पर सीधा सवाल है. कहां थी सुरक्षा? कहां था डर? या फिर अब डर सिर्फ आम आदमी के हिस्से में रह गया है?
सियासत, दुश्मनी या संदेश?
इस हत्या के पीछे क्या कारण है… यह जांच का विषय है. लेकिन तरीका बहुत कुछ कह रहा है. यह सिर्फ बदला नहीं लगता. यह एक संदेश जैसा लगता है. एक ऐसा संदेश जो डर पैदा करता है…और चुप्पी थोपता है.
जब सड़कों पर कानून हार जाए
राजकुमार चौहान अब नहीं हैं. लेकिन उनका आखिरी 100 मीटर…एक सवाल बनकर रह गया है. क्या हमारे शहरों की सड़कें अब सुरक्षित नहीं रहीं? या फिर अपराधियों का आत्मविश्वास इतना बढ़ चुका है कि उन्हें अब किसी का डर नहीं रहा?
