दिल्ली की मीटिंग में जंगल की हलचल – क्या गणपति सच में हथियार डालेंगे?

संजीव पॉल
संजीव पॉल

तेलंगाना के मुख्यमंत्री Revanth Reddy ने बुधवार शाम नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah से मुलाकात की।
सरकारी बयान साफ था “पुलिस फोर्स को मजबूत करना और surrender policy पर चर्चा।”

लेकिन सियासत में जो नहीं कहा जाता, वही अक्सर सबसे बड़ा होता है। मीटिंग रूम में मौजूद थे डीजीपी बी. शिवधर रेड्डी समेत टॉप पुलिस अफसर और यहीं से चर्चा उठी क्या देश के सबसे बड़े माओवादी चेहरों में से एक गणपति हथियार डालने वाले हैं?

कौन हैं गणपति? नाम से ज्यादा नेटवर्क

मुप्पाला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति कभी स्कूल टीचर। 1983 में भूमिगत और फिर जंगल की राजनीति के रणनीतिकार। 2004 में पीपुल्स वार ग्रुप और माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर के विलय के बाद बने Communist Party of India (Maoist) के महासचिव। 2004 से 2018 तक संगठन का चेहरा।

आज उम्र 70 पार। सिर पर 3.5 करोड़ से ज्यादा का इनाम और सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं। जंगल की क्रांति का पोस्टर बॉय अब बीमारी और समय के दबाव में।

591 सरेंडर: आंकड़ा या संकेत?

मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, पिछले दो वर्षों में तेलंगाना में 591 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है। सरकार कहती है, “Rehabilitation policy काम कर रही है।”

लेकिन सवाल यह भी है क्या ये ideological shift है या operational pressure?

छत्तीसगढ़ और झारखंड में सक्रिय कैडर की संख्या लगातार सिमट रही है। फंडिंग चैनल टूटे हैं। टेक्नोलॉजी ट्रैकिंग बढ़ी है। जंगल अब उतना सुरक्षित नहीं जितना 90 के दशक में था।

देवजी के बाद अगला नाम?

हाल ही में वरिष्ठ माओवादी कमांडर थिप्पिरी तिरुपति उर्फ देवजी ने हैदराबाद में आत्मसमर्पण किया। उसके बाद से गणपति का नाम तेज़ी से उछला। परिजनों ने भी जगत्याल जिले से अपील की “घर लौट आइए। उम्र हो चुकी है।”

यह सिर्फ सुरक्षा रणनीति नहीं, भावनात्मक दबाव भी है और कई बार जंगल से बाहर आने का रास्ता गोली नहीं, घर का दरवाज़ा खोलता है।

सरकार की चुप्पी, पुलिस की सावधानी

तेलंगाना पुलिस ने आधिकारिक तौर पर किसी बातचीत या संभावित आत्मसमर्पण की पुष्टि नहीं की है। क्योंकि अगर डील चल रही हो — तो silence ही strategy होती है। गणपति का सरेंडर अगर होता है, तो यह symbolic होगा। Operational impact सीमित हो सकता है — क्योंकि नई पीढ़ी का नेतृत्व पहले ही बदल चुका है। लेकिन narrative impact? बहुत बड़ा।

लाल आतंक का अंत या नया अध्याय?

लगभग चार दशकों से देश में वामपंथी उग्रवाद एक सुरक्षा चुनौती रहा है। कभी “क्रांति” के नाम पर, कभी “जनता की सरकार” के नाम पर। अगर गणपति हथियार डालते हैं, तो यह headline बनेगा “माओवाद का अंत।”

लेकिन ground reality यह कहती है विचारधाराएं surrender नहीं करतीं, लोग करते हैं। और असली लड़ाई बंदूक से ज्यादा विकास, सड़क, स्कूल और विश्वास की होती है।

जंगल से ज्यादा बदल गया देश

जिस भारत में गणपति ने आंदोलन शुरू किया था, वह 1980 का भारत था। आज surveillance tech, intelligence grid और development push ने जमीन बदल दी है। अब सवाल यह नहीं कि गणपति surrender करेंगे या नहीं। सवाल यह है क्या लाल गलियारों में बंदूक की जगह भविष्य की बातचीत ले पाएगी? दिल्ली की मीटिंग खत्म हो चुकी है। जंगल अब भी इंतज़ार में है।

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