
बिहार में कचरा प्रबंधन को लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है। पूर्व नगर विकास मंत्री Jivesh Mishra ने दावा किया कि पटना में कचरे का लगातार निस्तारण किया जा रहा है और शेष कचरे के लिए भी कंपनी का चयन हो चुका है। उनके मुताबिक, जहां भी कचरे से जुड़ी समस्या है, उसे चरणबद्ध तरीके से खत्म किया जाएगा।
उन्होंने यह भी कहा कि देश में पटना ऐसा शहर है जहां Waste Management के साथ-साथ कचरे से खाद और गैस बनाने की दिशा में भी काम चल रहा है यानी Garbage से Green Energy की ओर कदम।
“क्या आप प्रोक्सी मंत्री हैं?” — सदन में तंज
सदन में जैसे ही जीवेश मिश्रा ने जवाब देना शुरू किया, बीजेपी विधायक Dr. Sunil Kumar ने तीखा सवाल दाग दिया, “क्या आप प्रोक्सी मंत्री हैं?”
यह टिप्पणी केवल व्यक्तिगत नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि जवाब देने का अधिकार किसके पास है और जिम्मेदारी कौन लेगा। Assembly में यह पल कुछ सेकंड का था, लेकिन राजनीतिक संदेश लंबा गया।
बिहार शरीफ में Ground Reality क्या?
डॉ. सुनील कुमार ने आरोप लगाया कि बिहार शरीफ में न तो कचरे का नियमित उठाव हो रहा है और न ही उसका वैज्ञानिक प्रबंधन। उनका कहना है कि अगर राजधानी पटना में मॉडल प्रोजेक्ट की बात हो रही है, तो जिलों में Ground Implementation क्यों कमजोर है?
यानी सवाल यह है, क्या Urban Development सिर्फ प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित है या सड़कों पर भी दिखता है?
कचरा तो शहरों में पड़ा है, लेकिन असली बदबू राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से उठ रही है।
एक तरफ दावा — “कंपनी चुन ली गई है।”
दूसरी तरफ आरोप — “कचरा उठ ही नहीं रहा।”

Public पूछ रही है, “Garbage Processing Plant पहले बनेगा या Political Processing Plant?”
अगर पटना में कचरे से खाद और गैस बन रही है, तो यह Urban Sustainability के लिहाज से सकारात्मक कदम है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह मॉडल बिहार के अन्य शहरों में भी replicate होगा?
Waste to Energy प्रोजेक्ट्स केवल टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि Continuous Monitoring और Accountability भी मांगते हैं।
Political Optics vs Public Health
कचरा केवल सफाई का मुद्दा नहीं है यह Public Health, Environment और Civic Governance से जुड़ा विषय है। जब सदन में Garbage पर बहस होती है, तो जनता चाहती है कि बहस के साथ समाधान भी निकले, सिर्फ Headlines नहीं।
बिहार में कचरा प्रबंधन अब सिर्फ Municipal Issue नहीं रहा यह Political Accountability का टेस्ट बन चुका है। अब देखना यह है कि बयानबाज़ी से आगे बढ़कर ज़मीन पर कितना बदलाव दिखता है।
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