
कोलकाता की सड़कों पर इस बार सिर्फ ट्रैफिक नहीं tension भी जाम है। भवानीपुर सीट अब सिर्फ एक चुनावी मैदान नहीं रही, यह ego, legacy और revenge का अखाड़ा बन चुकी है। एक तरफ “दीदी” हैं, जिनके लिए यह घर है दूसरी तरफ वही चेहरा, जिसने नंदीग्राम में उन्हें गिराया था।
इस बार कहानी सीधी है—“घर बचाओ vs इतिहास दोहराओ”।
“दीदी का किला: भवानीपुर क्यों?”
Mamata Banerjee के लिए भवानीपुर सिर्फ सीट नहीं, identity है। यहीं से 2011, 2016 और फिर 2021 उपचुनाव में उन्होंने जीत दर्ज की। नंदीग्राम की हार के बाद भी उन्होंने इसी सीट से 58,000+ वोटों से comeback किया था। यानी भवानीपुर उनके लिए “political recharge station” है।
यहां का multi-community वोट बैंक—बंगाली, गुजराती, पंजाबी, मारवाड़ी हमेशा “दीदी फैक्टर” के साथ खड़ा रहा है।
“चैलेंजर की एंट्री: सीधा वार”
Suvendu Adhikari को BJP ने भवानीपुर और नंदीग्राम दोनों से उतारकर साफ message दिया है— “यह सिर्फ चुनाव नहीं, direct मुकाबला है।”
नंदीग्राम में 2021 की जीत के बाद शुभेंदु अब psychological edge के साथ मैदान में हैं। अगर वे यहां भी जीतते हैं, तो यह सिर्फ सीट नहीं, narrative बदलने वाली जीत होगी।
“भवानीपुर का गणित: वोट बैंक की केमिस्ट्री”
Bhabanipur सीट पर करीब 2.5-3 लाख मतदाता हैं। यहां middle class, intellectuals, business community और minorities का मिश्रण है। TMC को यहां personal connect का फायदा मिलता है, जबकि BJP symbolic battle लड़ रही है।
यानी यह चुनाव सिर्फ numbers का नहीं… emotions और perception का भी है।
“डिफेंसिव या स्मार्ट मूव?”
ममता बनर्जी का भवानीपुर से चुनाव लड़ना कई लोगों को defensive strategy लगता है लेकिन राजनीति में defense भी attack का हिस्सा होता है। यहां से जीतना उनके लिए सिर्फ सीट नहीं, CM पद की stability का सवाल है। अगर हार गईं… तो सियासी समीकरण domino की तरह गिर सकते हैं।

“Political Experts की राय”
पॉलिटिकल एक्सपर्ट सुरेन्द्र दुबे कहते हैं
“भवानीपुर ममता का fortress है, लेकिन fortress भी तब तक मजबूत रहता है जब तक अंदर भरोसा कायम हो। BJP ने इस बार अंदर घुसकर लड़ाई छेड़ी है।”
वहीं रूबी अरुण का कहना है, “यह चुनाव narrative का है। अगर शुभेंदु यहां जीतते हैं, तो यह सिर्फ एक सीट की हार नहीं, ममता के political aura पर बड़ा dent होगा।”
दोनों की बातों में एक common thread है यह battle symbolic से ज्यादा psychological है।
“नंदीग्राम की परछाई अब भी मौजूद”
नंदीग्राम की हार अभी भी इस मुकाबले के background में shadow की तरह मौजूद है। हर रैली, हर भाषण में उसका असर दिखेगा। यह चुनाव सिर्फ वर्तमान नहीं, past का हिसाब भी मांग रहा है।
भवानीपुर में इस बार वोट सिर्फ EVM में नहीं डाले जाएंगे बल्कि political legacy के खाते में जमा होंगे। यह लड़ाई सीट की नहीं “सत्ता की सांस और साख की आखिरी परीक्षा” है।
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