
लोकसभा में बजट चर्चा के दौरान सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने सरकार पर ऐसा हमला बोला कि सत्ता पक्ष असहज नजर आया। उनका साफ आरोप था ना किसान सरकार की प्राथमिकता है ना आम आदमी की जेब की चिंता।
अखिलेश ने कहा, “किसानों की आय दोगुनी करने के वादे कहां गए? आज किसान खेत में नहीं, संकट में खड़ा है।”
US Trade Deal पर तंज: Deal नहीं, Dheel
भारत-अमेरिका फ्री ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर अखिलेश यादव ने सबसे तीखा कटाक्ष किया। उनका कहना था “अगर यही डील करनी थी तो 11 महीने का ड्रामा क्यों? ये डील नहीं, साफ-साफ ढील है।”
उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार हर मंच पर FTA की ढोलक पीट रही है, तो रुपया कमजोर क्यों हो रहा है? इतनी डील्स के बाद भी आम आदमी को फायदा क्यों नहीं? “18 बड़ा है या Zero? BJP का गणित यही है!” — यह लाइन सदन में गूंजती रही।
One-Sided Agreement? आत्मनिर्भरता गई कहां
अखिलेश यादव ने कहा कि बजट से पहले ही सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ शब्दकोष से हटा दिया। 500 Billion Dollar का भारतीय बाजार खोल दिया गया, लेकिन सवाल वही है स्वदेशी उद्योग कहां जाएंगे? किसान क्या उगाएगा, क्या बेचेगा?
उन्होंने तंज कसते हुए कहा “डील कभी एकतरफा नहीं होती, पर यहां पूरा देश समझ रहा है कि पलड़ा किस तरफ झुका है।”
Vision 2047 या Directionless Budget?
सपा प्रमुख ने बजट को दिशाहीन करार दिया। उनका कहना था कि 2047 का कोई स्पष्ट रोडमैप नहीं। Nominal GDP growth जरूरत से कम। Per capita income अब भी करीब $3000, Global ranking में भारत 144वें स्थान पर।
“10-12 साल के बजट के बाद भी लोगों की आय नहीं बढ़ी, तो फिर आंकड़ों की बाजीगरी किसके लिए?”

किसान, MSP और टूटी उम्मीदें
अखिलेश यादव ने MSP की कानूनी गारंटी न मिलने पर सरकार को घेरा। उन्होंने भावुक अंदाज में कहा, “फसल का दाम नहीं, खाद-बीज महंगा, सिंचाई मुश्किल… और सोना इतना महंगा कि गरीब बेटी की विदाई भी सपना बन गई।”
उनकी चर्चित पंक्ति “लोहे पर पीतल चढ़ाकर भी गरीब बेटी को विदा नहीं कर पाएगा” ने सदन में सन्नाटा खींच दिया।
यूपी और डबल इंजन का सवाल
यूपी का जिक्र करते हुए अखिलेश ने पूछा कि PM का संसदीय क्षेत्र होने के बावजूद केंद्र के बजट से एक भी नया एक्सप्रेसवे क्यों नहीं? उन्होंने पुराने एक्सप्रेसवे नाम बदलने पर भी कटाक्ष किया “जो कागजों पर बनता है, वही जल्दी नाम बदल लेता है।”
बजट बड़ा है, भाषण भारी हैं लेकिन जनता पूछ रही है रोजगार कहां है? किसान की खरीद कहां है? आम आदमी की फिक्र कहां है?
अखिलेश के शब्दों में“जिस सरकार से उम्मीद नहीं, उसके बजट से क्या उम्मीद करें?”
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