
मिडिल ईस्ट की रातें इन दिनों सिर्फ अंधेरी नहीं हैं, वे बारूद की गंध से भरी हुई हैं। ईरान और इजरायल के बीच भड़की जंग ने खाड़ी क्षेत्र को युद्ध के ऐसे चक्रव्यूह में धकेल दिया है, जहां से निकलने का रास्ता किसी को दिखाई नहीं दे रहा।
अमेरिका और इजरायल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया। जवाब में ईरान ने इजरायल के साथ-साथ अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना दिया।
अब हालात यह हैं कि करीब 15 देश इस संघर्ष की आग में झुलसते नजर आ रहे हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब दुनिया के सबसे बड़े वैश्विक संगठन मौजूद हैं, तो फिर यह युद्ध बिना रोक-टोक क्यों बढ़ता जा रहा है?
होर्मुज स्ट्रेट: तेल की नब्ज पर पड़ा युद्ध का हाथ
दुनिया की अर्थव्यवस्था की धड़कन कहे जाने वाले होर्मुज स्ट्रेट पर इस जंग का सबसे बड़ा असर पड़ा है। अगर यह समुद्री मार्ग पूरी तरह बंद हो जाता है तो सिर्फ खाड़ी देश ही नहीं, बल्कि भारत, पाकिस्तान और एशिया के कई देशों को तेल और गैस की भारी कमी झेलनी पड़ेगी।
अगर यह संकट लंबा खिंचता है तो वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं। और यही वह बिंदु है जहां यह जंग सिर्फ क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह जाती, बल्कि वैश्विक आर्थिक संकट का ट्रिगर बन सकती है।
संयुक्त राष्ट्र संघ की खामोशी का असली कारण
सवाल उठता है कि संयुक्त राष्ट्र संघ आखिर चुप क्यों है? असल वजह है उसका अपना ढांचा। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन। युद्ध को लेकर इन पांचों की राय एक नहीं है। अमेरिका इस सैन्य कार्रवाई का हिस्सा है, जबकि रूस और चीन खुले तौर पर इसके विरोध में खड़े हैं।
ऐसे में कोई भी प्रस्ताव सामने आता है तो वीटो की तलवार उसे वहीं गिरा देती है। सीधी भाषा में कहें तो दुनिया की शांति की जिम्मेदारी जिन देशों के हाथ में है, वही इस लड़ाई में अलग-अलग खेमों में खड़े हैं।

BRICS और भारत की सतर्क चुप्पी
BRICS देशों का रुख भी दिलचस्प है। ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश अब इस समूह का हिस्सा हैं। यानी संगठन के भीतर ही युद्ध के अलग-अलग पक्ष मौजूद हैं। इसलिए कोई संयुक्त बयान सामने नहीं आया। भारत भी इस मामले में बेहद सावधानी से कदम रख रहा है।
नई दिल्ली की रणनीति साफ है ना किसी के पक्ष में खुलकर खड़ा होना, ना किसी को खुलकर नाराज करना। राजनयिक भाषा में इसे Strategic Silence कहा जाता है।
NATO और यूरोप की दूरी
दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका के अपने सहयोगी देश भी इस युद्ध से दूरी बना रहे हैं। फ्रांस और ब्रिटेन ने सैन्य सहयोग से इनकार कर दिया है। इटली और स्पेन ने भी साफ कर दिया है कि वे किसी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं बनेंगे। यूरोप का मानना है कि यह युद्ध अगर फैलता है तो इसकी आग सीधे उनके दरवाजे तक पहुंचेगी।
इसलिए वे कूटनीति की बात कर रहे हैं, जबकि अमेरिका अभी भी सैन्य दबाव की रणनीति पर कायम है।
जंग सिर्फ हथियारों से नहीं, राजनीति से भी लड़ी जाती है
मिडिल ईस्ट की यह जंग सिर्फ मिसाइलों और ड्रोन की लड़ाई नहीं है। यह वैश्विक राजनीति का वह खेल है जिसमें हर देश अपने हितों की शतरंज खेल रहा है। संयुक्त राष्ट्र की मजबूरी, BRICS की आंतरिक राजनीति और NATO की दूरी इन सबने मिलकर एक ऐसा माहौल बना दिया है जहां युद्ध रोकने वाला कोई दिखाई नहीं देता। और यही वजह है कि खाड़ी की आग अभी शांत होने से बहुत दूर नजर आ रही है।
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