
मिडिल ईस्ट में तनाव अब खुली जंग में बदल चुका है। ईरान और इज़रायल के बीच टकराव ने खतरनाक मोड़ ले लिया है। देश के सर्वोच्च नेता Ali Khamenei की हमले में मौत हो गई है। तेहरान की सड़कों पर बेचैनी साफ दिखाई दे रही है।
ईरान ने बदले की चेतावनी दी है“अब तक का सबसे घातक जवाब।” यह बयान सिर्फ सैन्य प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है।
तेहरान में खामोशी, स्क्रीन पर आग
राजधानी Tehran में सरकारी इमारतों के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। टीवी चैनलों पर शोक संगीत और धार्मिक उद्धरण चल रहे हैं। लोग छोटे-छोटे समूहों में चर्चा कर रहे हैं क्या यह सिर्फ एक लीडर की मौत है या एक युग का अंत?
1979 की गूंज: खुमैनी की विरासत फिर सुर्खियों में
ऐसे समय में 1979 की इस्लामिक क्रांति का जिक्र फिर तेज हो गया है। यह वही आंदोलन था, जिसने शाह शासन को हटाकर इस्लामिक गणराज्य की नींव रखी। इस क्रांति के सूत्रधार थे Ruhollah Khomeini।
उनकी तस्वीर आज भी ईरान की दीवारों, नोटों और संस्थानों पर दिखती है। 1979 में सत्ता परिवर्तन ने ईरान की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया।
बाराबंकी कनेक्शन: इतिहास का दिलचस्प मोड़
बहुत कम लोग जानते हैं कि खुमैनी के पूर्वजों का संबंध भारत के Barabanki से जोड़ा जाता है। किंतूर गांव, जो कभी शिया विद्वानों का प्रमुख केंद्र था, वहां से उनके दादा सैयद अहमद मुसावी का नाम जुड़ता है।
कहा जाता है कि उन्होंने अपने नाम के साथ ‘हिंदी’ जोड़ा था भारत से भावनात्मक जुड़ाव के प्रतीक के रूप में। हालांकि, ईरान में उनके विरोधियों ने इसी कड़ी को राजनीतिक हथियार बनाया।

शाह बनाम क्रांति
1970 के दशक के अंत में Mohammad Reza Pahlavi की सरकार ने खुमैनी को विदेशी बताकर उनकी वैधता पर सवाल उठाए। लेकिन निर्वासन से लौटे खुमैनी ने जनसमर्थन की लहर पैदा कर दी।
1979 में इस्लामिक क्रांति सफल हुई और वे सर्वोच्च नेता बने। उनके बाद उनके शिष्य अली खामेनेई ने सत्ता संभाली और दशकों तक देश की नीतियों को दिशा दी।
बाराबंकी के नसीपुर ग्राम निवासी कामिनी शर्मा कहती हैं कि मुसावी साहेब का किंतूर वाला घर हमारे बचपन से ही सैय्यद बाड़ा कहा जाता था। हम अपने पिता व भाई के साथ कई बार वहां गए हैं। एक समय में ये घर और गांव शिया समुदाय के बुद्धिजीवियों का गढ़ रहा है।
आज की जंग और कल की विरासत
आज जब इज़रायल-ईरान युद्ध की आग भड़क रही है, खुमैनी की विरासत और खामेनेई की भूमिका पर नए सिरे से बहस हो रही है। यह सिर्फ सैन्य संघर्ष नहीं यह विचारधाराओं, क्षेत्रीय वर्चस्व और ऐतिहासिक स्मृतियों की जंग भी है।
मिडिल ईस्ट की राजनीति में “अंत” कभी अंत नहीं होता वह अगली शुरुआत की प्रस्तावना होता है। एक लीडर जाता है, एक विचार बचा रहता है। और कभी-कभी विचार मिसाइल से ज्यादा दूर तक जाता है।
दुनिया की निगाहें अब तेहरान, तेल अवीव और वॉशिंगटन पर टिकी हैं।
