मंदिरों की कमाई जनकल्याण में लगे, कमिटी में हर वर्ग का व्यक्ति होना चाहिए

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने लखनऊ में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में कहा कि मंदिरों की आय का बड़ा हिस्सा जनकल्याण में लगाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि मंदिरों की बागडोर सरकार के बजाय जिम्मेदार भक्तों के हाथों में होनी चाहिए।

बात सुनने में appealing है धर्मस्थल समाज के लिए हों, सिर्फ संरचना के लिए नहीं। लेकिन असली चर्चा यहीं से शुरू होती है।

“हिंदू समाज को जगाना” कैसे?

एक सवाल के जवाब में भागवत ने कहा कि संघ की सबसे बड़ी चुनौती हिंदू समाज को जगाना है।

यहां प्रश्न उठता है  “जागरण” का अर्थ क्या है? सांस्कृतिक चेतना? सामाजिक जिम्मेदारी? या प्रशासनिक भागीदारी?

शब्द शक्तिशाली होते हैं, लेकिन उनकी स्पष्ट परिभाषा और रोडमैप उससे भी ज्यादा जरूरी होता है।

मंदिर प्रबंधन: भक्तों के हाथ, लेकिन कौन से भक्त?

भागवत का सुझाव है कि मंदिरों का संचालन सरकार नहीं, बल्कि जिम्मेदार श्रद्धालु करें। यह विचार autonomy की दिशा में कदम हो सकता है। लेकिन practical सवाल यह है क्या प्रबंधन समिति में हर वर्ग का प्रतिनिधित्व होगा? क्या योग्यता आधारित चयन होगा? क्या पारदर्शिता और ऑडिट की व्यवस्था तय होगी?

अगर बागडोर भक्तों के हाथ में जाए, तो यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि वह सिर्फ चुनिंदा लोगों तक सीमित न रह जाए। बल्कि समाज के हर वर्ग का व्यक्ति उसमें शामिल हो।

Inclusive Model की जरूरत

आज का समाज diversity से बना है। ऐसे में मंदिर प्रबंधन समितियों में हर सामाजिक वर्ग, महिला प्रतिनिधित्व, युवा भागीदारी और वित्तीय विशेषज्ञता को शामिल करना जरूरी होगा।

सिर्फ भावना नहीं, structure भी चाहिए। सिर्फ श्रद्धा नहीं, सिस्टम भी चाहिए।

Consensus Building क्यों जरूरी?

भागवत का सामाजिक प्रभाव व्यापक है। यदि वे सचमुच इस दिशा में पहल करना चाहते हैं, तो देशभर के महंतों, शंकराचार्यों और मंदिर ट्रस्टों के साथ संवाद शुरू करना एक बड़ा कदम हो सकता है। Reform तभी टिकाऊ होगा, जब वह आम सहमति से आए वरना बयान headline बनते हैं, मॉडल rarely बन पाते हैं।

Faith, Funds & Accountability

मंदिरों की आय समाज के कल्याण में लगे इस पर शायद ही कोई असहमति हो। लेकिन governance model क्या होगा? Financial transparency कैसे सुनिश्चित होगी? और सबसे अहम क्या यह reform ground reality में लागू हो पाएगा? यही वह बिंदु है जहां विचार से ज्यादा implementation की परीक्षा शुरू होती है।

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