
शब-ए-बरात इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक शाबान महीने की 15वीं रात को मनाई जाती है। अरबी में “Shab” का मतलब रात और “Barat” का अर्थ है मुक्ति या निजात। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार, यह वो रात है जब
इंसानों की तक़दीर लिखी जाती है। गुनाहों की माफी का दरवाज़ा खुला होता है। अगले साल की जिंदगी, मौत, रोज़ी के फैसले होते हैं।
इसीलिए इसे Night of Forgiveness भी कहा जाता है।
शब-ए-बरात का धार्मिक महत्व
इस रात को अल्लाह की रहमत खास तौर पर नाज़िल होती है। फरिश्ते इंसानों के अमल दर्ज करते हैं। सच्चे दिल से की गई दुआ कबूल होने की उम्मीद बढ़ जाती है। कहा जाता है कि इस रात अल्लाह फरमाता है “क्या कोई है जो माफी मांगे? मैं माफ कर दूं।”
इस रात क्या करते हैं लोग?
नफ़्ल नमाज़, क़ुरआन की तिलावत, अपने गुनाहों पर तौबा, कब्रिस्तान जाकर दुआ अगले दिन कुछ लोग रोज़ा भी रखते हैं। लेकिन असली मकसद रिवाज नहीं, रूहानी सफ़ाई है।
शब-ए-बरात हमें क्या सिखाती है?
हर गलती का सुधार संभव है। माफी मांगना कमजोरी नहीं, ताकत है। रिश्तों में अहंकार छोड़ना जरूरी है। मौत और जिंदगी दोनों अल्लाह के हाथ में हैं। आज के भागदौड़ भरे दौर में, शब-ए-बरात हमें Pause button दबाने की सीख देती है।
आज के ज़माने में शब-ए-बरात का मतलब
यह सिर्फ इबादत की रात नहीं, बल्कि Self-reflection की रात। Ego detox की रात। नई शुरुआत की रात है। जहां इंसान खुद से पूछता है “अगर आज आखिरी रात हो, तो क्या मैं माफ़ी के काबिल हूं?”

नज्म
“आज की रात कुछ अलग है”
आज की रात कुछ अलग है,
ख़ामोशी में भी दुआ की आवाज़ है।
झुके हुए सिर, भीगी पलकों में,
माफी की उम्मीद, दिल के पास है।
जो टूट गए थे, उन्हें जोड़ दे मौला,
जो भटक गए, उन्हें राह दिखा।
शब-ए-बरात की इस पाक रात में,
हम सबको फिर से इंसान बना।
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