UGC के नए नियमों पर सुप्रीम रोक- कहीं हम फिर जातियों में तो नहीं लौट रहे

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

देशभर के कॉलेज कैंपस इन दिनों पढ़ाई से ज़्यादा पॉलिसी पॉलिटिक्स के अखाड़े बन चुके हैं। वजह है UGC के नए ‘Equity Regulations’, जिन पर अब सुप्रीम कोर्ट ने ब्रेक लगा दिया है

13 जनवरी को जारी इन नियमों में हर कॉलेज और यूनिवर्सिटी को Equity Center, Equity Squad और Equity Committee बनाना अनिवार्य किया गया था। मकसद था—भेदभाव खत्म करना।
लेकिन सवाल उठा—क्या तरीका सही है? यही सवाल अब कोर्ट तक पहुंच गया।

Supreme Court में क्या हुआ?

29 जनवरी की सुनवाई में CJI ने बेहद अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि “रेगुलेशन की भाषा देखकर लगता है कि इसका दुरुपयोग संभव है।”

CJI का यह बयान सीधे उस डर की ओर इशारा करता है, जो सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे छात्रों और संगठनों के मन में बैठा है।

उन्होंने और भी तीखा सवाल पूछा, “75 साल बाद क्या हम फिर से जाति आधारित समाज की ओर लौट रहे हैं?”

ये लाइन सिर्फ कोर्टरूम में नहीं, बल्कि पूरे देश की बहस में गूंज गई।

UGC के नए नियमों में ऐसा क्या है?

UGC के अनुसार 2020–2025 के बीच SC, ST, OBC से जुड़ी शिकायतों में 100% से ज्यादा बढ़ोतरी हुई। इसलिए हर संस्थान में 24×7 हेल्पलाइन, अनिवार्य Equity Committees, SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व।

साथ ही साफ चेतावनी दी गई— नियम नहीं माने तो मान्यता रद्द या फंड रोक दिया जाएगा। यहीं से मामला गरमा गया।

सवर्ण समाज में नाराज़गी क्यों?

आरोप है कि ये नियम आपसी खाई बढ़ा सकते हैं। Campus में ‘शिकायत संस्कृति’ को हथियार बना सकते हैं। और सामान्य छात्रों को Defensive Mode में डाल देंगे।

Equity लाने के नाम पर कहीं Equality ही न टूट जाए।

कोर्ट में कानूनी चुनौती

वरिष्ठ वकील विष्णु शंकर जैन ने रेगुलेशन के Section 3(c) को चुनौती देते हुए कहा कि “Caste-based discrimination test अपने आप में असंवैधानिक है।” उनका तर्क साफ है, समस्या खत्म करने के नाम पर समाज को और वर्गों में मत बांटो।

सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

कोर्ट ने फिलहाल UGC के नियमों पर रोक लगाई। केंद्र सरकार को कहा कि एक High-Level Committee बनाए, जो यह तय करे कि भेदभाव कैसे रुके लेकिन समाज और कैंपस में नई दीवारें न खड़ी हों। यानी Balance ही असली Challenge है।

UGC का इरादा शायद नेक हो, लेकिन नीतियों की भाषा अगर गलत हो जाए, तो न्याय की जगह डर पैदा हो जाता है।

अब सवाल यही है— क्या Equity की लड़ाई में हम Unity खो देंगे?

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