
उत्तर प्रदेश के बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री का मामला अब सिर्फ एक इस्तीफा नहीं, बल्कि system vs officer showdown में बदल चुका है। इस्तीफा देने के अगले ही दिन अलंकार को निलंबित कर दिया गया, जिसके बाद उन्होंने सीधे बरेली कलेक्ट्रेट पहुंचकर धरना शुरू कर दिया।
यह घटनाक्रम प्रशासनिक हलकों में असहजता और सियासी गलियारों में हलचल दोनों पैदा कर रहा है।
‘रात भर बंधक बनाए जाने की साजिश’
धरने पर बैठे निलंबित सिटी मजिस्ट्रेट ने बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उन्होंने इस्तीफा पहले ही सौंप दिया था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें जानबूझकर डीएम कार्यालय में रोके रखने की कोशिश की गई।
अलंकार अग्निहोत्री के मुताबिक, “डीएम साहब को फोन आया कि इस ‘पंडित’ को यहीं बैठाए रखा जाए और पूरी रात जाने न दिया जाए।”
उन्होंने दावा किया कि यह एक planned conspiracy थी, ताकि उनसे जबरन बयान दिलवाकर किसी अन्य आरोप में कार्रवाई की जा सके।
मीडिया की मौजूदगी से टूटी ‘रात की योजना’
अलंकार ने बताया कि जब उन्हें बंधक बनाए जाने का अंदेशा हुआ, तो उन्होंने बार एसोसिएशन के सचिव दीपक पांडे को फोन कर मीडिया को सूचना देने को कहा। जैसे ही यह बात बाहर आई, कथित तौर पर उन्हें जाने दिया गया।
उनका आरोप है कि अगर मीडिया को भनक न लगती, तो पूरी रात उन्हें प्रशासनिक दबाव में रखा जाता।
UGC नियम और शंकराचार्य विवाद से जुड़ा मामला
गौरतलब है कि अलंकार अग्निहोत्री ने UGC नियमों और अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ी कथित मारपीट के विरोध में इस्तीफा दिया था। इसके बाद यह मुद्दा प्रशासनिक सीमाओं से बाहर निकलकर ideological confrontation का रूप ले चुका है।

‘निलंबन को कोर्ट में चुनौती देंगे’
अलंकार अग्निहोत्री ने साफ किया कि वे अपने निलंबन आदेश को अदालत में चुनौती देंगे। साथ ही उन्होंने मांग की कि एक विशेष जांच समिति बनाई जाए। फोन कॉल्स और आदेशों की फोरेंसिक जांच हो। यह साफ किया जाए कि किसके निर्देश पर यह सब हुआ।
उधर, प्रशासन ने कमिश्नर की अध्यक्षता में विभागीय जांच के आदेश जारी कर दिए हैं।
राष्ट्रपति शासन की मांग, तीखा सियासी बयान
धरने के दौरान अलंकार ने बड़ा राजनीतिक बयान देते हुए कहा, “मैं जानना चाहता हूं कि मुझे ‘पंडित’ कहकर गाली देने वाला कौन था और किस विचारधारा से जुड़ा है।”
उन्होंने दावा किया कि संवैधानिक व्यवस्था चरमरा गई है और इसे बहाल करने के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया जाना चाहिए।
कुर्सी गई, चुप्पी नहीं?
UP की ब्यूरोक्रेसी में अब सवाल ये नहीं कि अफसर सस्पेंड हुआ या नहीं, सवाल ये है कि क्या सिस्टम असहमति झेलने को तैयार है?
जब अफसर फाइलें छोड़कर धरने पर उतर आएं, तो समझिए मामला सिर्फ नियमों का नहीं, न्याय की धारणा का भी है।
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