गाली देने में नंबर 1 कौन? कानपुर टॉप पर, लखनऊ-प्रयागराज भी पीछे नहीं

अजमल शाह
अजमल शाह

कभी “कानपुर वाला ठसक” और “कानपुरिया स्टाइल” के लिए मशहूर ये शहर अब नए अवॉर्ड की कतार में खड़ा है — “भारत का सबसे गालीबाज शहर” का।
एक हालिया रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि उत्तर प्रदेश के टॉप 10 गाली देने वाले शहरों में कानपुर नंबर 1 पर है। लखनऊ और प्रयागराज ने भी इस प्रतियोगिता में पूरे सम्मान के साथ जगह बनाई है।

टॉप 10 में लखनऊ, प्रयागराज और… चौथी क्लास के बच्चे भी!

अब तक जो लोग सोचते थे कि गाली देना सिर्फ “बड़े” करते हैं, उन्हें इस रिपोर्ट की एक लाइन हिला देगी —

“गालियों का पहला ज्ञान बच्चों को चौथी क्लास में ही मिल रहा है!”
हां, ठीक पढ़ा आपने। टीचर बोर्ड पर पढ़ा रहे हैं और पीछे बैठा मोंटू “भोस**े”* कहकर टिफिन मांग रहा है।

सांस्कृतिक धरोहर या बोलचाल का पतन?

भाषा विकास में एक दौर वो भी था जब “नमस्कार”, “प्रणाम”, “आप कैसे हैं?” जैसे वाक्य आम थे। अब अगर कोई लखनऊ में ये बोले तो सामने वाला पूछता है —

“का हो, चुनाव लड़ रहे का?”

शब्दों का पतन ऐसा हुआ है कि “चचा”, “बौआ”, “बेटा”, “भैया” — ये सब अब गालियों के prefixes बन चुके हैं।

कानपुर की गाली भाषा: हिंग्लिश, बुंदेलखंडी और फीलिंग्स का कॉम्बो

कानपुर की खासियत ये है कि वहां की गाली सिर्फ शब्द नहीं, एक फीलिंग है — एक्सप्रेशन, इमोशन और इंटेंसन का तड़का!

“अबे भोस*, बढ़ न! तुमसे न हो पाएगा!”**
यहां “तुमसे न हो पाएगा” में गाली कम, क्लोजनेस ज़्यादा है।
कभी-कभी तो लगता है, “कानपुर में गाली देना संस्कार है, दुर्व्यवहार नहीं।”

बच्चों की जुबान पर गालियां – स्कूल से पहले आंगन में ही दीक्षा

आश्चर्यजनक डेटा कहता है कि आजकल के बच्चे प्ले-ग्रुप से पहले गाली-ग्रुप में भर्ती हो जाते हैं।

  • मां चुप करा रही है: “अरे चुप कर बे हरामी…”

  • बच्चा सीख रहा है: “मम्मा मुझे भी बोलना है ये…”

समाजशास्त्रियों ने इसे “सामाजिक संवाद का नया प्रारूप” बताया है।
(या कहें, फॉर्मल अब्यूज की इनफॉर्मल ट्रेनिंग!)

सोशल मीडिया और गालियों की मम्मी-बहन: Reel बनानी हो तो गाली जरूरी

Reel की शुरुआत हो — “अबे ओ चू**…”*
End हो — “भाई लोग लाइक ठोक दो वरना गालियां और देंगे!”
गाली अब एंगेजमेंट टूल बन चुकी है।

समाधान या समझौता? प्रशासन मौन, समाज कंफ्यूज

प्रशासन कहता है – “हम अभियान चलाएंगे”
समाज कहता है – “हम तो बचपन से ऐसे ही हैं”
टीचर कहता है – “भाषा सुधारो”
छात्र कहता है – “चुप बे गुरुजी…”

तो क्या ये भाषायी पतन है या नया लोक-संस्कृतिक उत्थान?
इसपर बहस होनी चाहिए… पर बिना गाली दिए तो अब होती ही नहीं।

क्या गाली अब नई भाषा बन चुकी है?

अगर हर भाव –

  • गुस्सा

  • प्यार

  • दोस्ती

  • हंसी
    – सबमें गाली घुसी हो, तो क्या हिंदी की नई डिक्शनरी छापनी पड़ेगी?

हो सकता है आने वाले समय में CBSE का एक नया विषय आए —

“गालियाविज्ञान – एक सामाजिक विमर्श”

कानपुर वाले सिर्फ गाली नहीं देते, वो भावनाएं परोसते हैं। और लखनऊ वाले? तहज़ीब के साथ ठेठपन की मिक्स प्लेट!
UP में गाली अब सिर्फ ज़ुबान नहीं, एक कल्चर, एक आर्ट और एक आईडेंटिटी बन चुकी है।

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