
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने State of the Union संबोधन में दावा किया कि भारत-पाकिस्तान के बीच हालिया तनाव परमाणु युद्ध में बदल सकता था। उनके मुताबिक, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उन्हें बताया कि अगर अमेरिकी हस्तक्षेप न होता तो लगभग 3.5 करोड़ लोगों की जान जा सकती थी। पाकिस्तान के पीएम की मौत हो जाती।
ट्रंप ने यह भी कहा कि अपने पहले 10 महीनों में उन्होंने “आठ युद्ध समाप्त” कराए—जिसमें दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिण एशिया के संकटों का जिक्र शामिल था।
पहलगाम से ऑपरेशन तक: पृष्ठभूमि
कश्मीर के पहलगाम में पर्यटकों पर हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने 7 मई को ऑपरेशन सिंदूर शुरू किया। भारतीय बलों ने एलओसी पार आतंकी ठिकानों पर कार्रवाई की। जवाब में पाकिस्तान की ओर से ड्रोन और यूसीएवी हमलों की कोशिश हुई, जिन्हें भारत के एयर डिफेंस सिस्टम ने नाकाम किया।
यानी जमीन पर तनाव, आसमान में ड्रोन और बीच में कूटनीति।
“परमाणु” शब्द और राजनीतिक तापमान
ट्रंप का यह दावा कि हालात परमाणु टकराव की ओर बढ़ सकते थे, वैश्विक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। आलोचकों का कहना है कि ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है, जबकि समर्थक इसे “डिप्लोमैटिक ब्रेकथ्रू” बता रहे हैं।
दुनिया में हर बयान ‘ब्रेकिंग’ हो, तो सच्चाई को भी हेलमेट पहनना पड़ता है!

रूस-यूक्रेन और ईरान पर भी टिप्पणी
संबोधन में ट्रंप ने Russo-Ukrainian War को लेकर कहा कि उनका प्रशासन “हत्या और नरसंहार” खत्म करने के लिए काम कर रहा है। उन्होंने दोहराया कि यदि वे पहले राष्ट्रपति होते तो यह युद्ध नहीं होता।
ईरान पर उन्होंने कड़े शब्दों के साथ यह भी जोड़ा कि वे अब भी कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देते हैं—हालांकि “सभी विकल्प खुले” हैं।
दावा, कूटनीति और नैरेटिव
ट्रंप का बयान ऐसे समय आया है जब दक्षिण एशिया में सुरक्षा समीकरण बेहद संवेदनशील हैं। क्या वाकई अमेरिकी मध्यस्थता निर्णायक रही? क्या 3.5 करोड़ का आंकड़ा कूटनीतिक अतिशयोक्ति है? या यह घरेलू राजनीति के लिए मजबूत विदेशी नीति का संदेश?
सच्चाई शायद कई परतों में छिपी है। लेकिन इतना तय है कि भारत-पाक तनाव का हर अध्याय वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित करता है।
