सुनो,अगर तुम्हारी पहचान तुम्हारे दिमाग से नहीं, तुम्हारी जाति से तय हो रही है, तो समझो कि समाज ने तुम्हें इंसान नहीं, फाइल बना दिया है। “जाति मेरे जूते की नाप है, दिमाग की नहीं” ये मैंने कोई नारा नहीं दिया। यह मानसिक आज़ादी का ऐलान है। जूते की नाप छोटी हो सकती है, बड़ी हो सकती है। बदल भी सकती है। लेकिन दिमाग? वह तो सीमाओं को तोड़ने के लिए बना है, उनमें कैद होने के लिए नहीं। युवाओं से सीधी बात तुम्हारी generation के पास इंटरनेट है, AI है,…
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