“टीम इंडिया में लखनऊ की कली कब खिलेगी? राजीव शुक्ल के नाम खुला खत”

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

क्रिकेट सिर्फ एक खेल नहीं, भारत में यह भावनाओं का राष्ट्रीय त्यौहार है. जब टीम इंडिया वर्ल्ड कप जीतती है, तो हर शहर अपने-अपने हिस्से की आतिशबाजी करता है. लेकिन इस जश्न के बीच कुछ शहर ऐसे भी होते हैं जिनके दिल में एक हल्की चुभन रह जाती है. लखनऊ उन्हीं शहरों में से एक है.

यह शहर क्रिकेट देखता भी है, समझता भी है, और खिलाड़ियों को पैदा करने का माद्दा भी रखता है. फिर भी टीम इंडिया की थाली में जब फूल सजते हैं, तो लखनऊ का फूल अक्सर नदारद दिखता है.

और यही सवाल अब सीधे जा रहा है Rajeev Shukla तक.

टीम इंडिया की थाली और लखनऊ की खाली जगह

अगर टीम इंडिया को एक थाली मान लें, तो उसमें हर राज्य का स्वाद मौजूद है. कभी पंजाब का तड़का, कभी मुंबई का मसाला, कभी दिल्ली की खुशबू. लेकिन इस थाली में लखनऊ का जायका अक्सर गायब दिखाई देता है. क्रिकेट के शौकीन कहते हैं कि यह शहर प्रतिभा की कमी से नहीं, बल्कि मौके की कमी से जूझ रहा है.

इकाना स्टेडियम की कहानी

लखनऊ का Bharat Ratna Shri Atal Bihari Vajpayee Ekana Cricket Stadium सिर्फ एक स्टेडियम नहीं, बल्कि उम्मीदों का मैदान है. यहां हर शाम नेट्स पर गेंद और बल्ले की आवाज गूंजती है. कई युवा खिलाड़ी अपने सपनों को पसीने से सींचते हैं.

लेकिन जब टीम इंडिया की घोषणा होती है, तो टीवी स्क्रीन पर नामों की लिस्ट में लखनऊ का कोई बच्चा नहीं दिखता. और यहीं से शुरू होता है सवालों का सिलसिला.

राजीव शुक्ल जी, जरा नजर-ए-करम भी करिए

क्रिकेट प्रशासन में बड़ा नाम रखने वाले राजीव शुक्ल भी उत्तर प्रदेश से आते हैं. इसलिए लखनऊ के क्रिकेट प्रेमी उनसे थोड़ी सी उम्मीद रखते हैं. यह उम्मीद शिकायत से ज्यादा एक विनम्र चुटकी है. जैसे कोई छोटा भाई बड़े भाई से कहे “भैया, जरा हमारी गली में भी झांक लीजिए.”

जश्न भी मनाया, कसक भी रही

जब टीम इंडिया ने वर्ल्ड कप जीता, तो लखनऊ ने भी दिवाली मनाई. पटाखे भी फूटे, मिठाइयां भी बंटी. क्योंकि टीम इंडिया सिर्फ खिलाड़ियों की नहीं, पूरे देश की टीम है. लेकिन जश्न के बीच एक छोटी सी कसक भी थी. काश उस टीम में लखनऊ का भी कोई लड़का होता.

प्रतिभा की कमी नहीं, मौका चाहिए

क्रिकेट कोच और स्थानीय खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि लखनऊ और उत्तर प्रदेश में प्रतिभा की कमी नहीं है. जरूरत सिर्फ उस नजर की है जो मैदान के कोने में खड़े किसी खिलाड़ी के अंदर छिपे सितारे को पहचान सके. और शायद यही उम्मीद इस खुले खत का असली मकसद भी है.

आखिर सवाल वही

लखनऊ पूछ रहा है. क्या यहां के बच्चों में दम नहीं रहा? या फिर बस मौका अभी तक रास्ता भटक गया है? अगर कभी वक्त मिले तो इकाना स्टेडियम का एक चक्कर लगा लीजिए. संभव है वहां कोई अगला स्टार बल्ला घुमाता हुआ मिल जाए. और जिस दिन ऐसा होगा, यकीन मानिए
लखनऊ सिर्फ जश्न नहीं मनाएगा, बल्कि क्रिकेट के इतिहास में अपना नाम भी लिख देगा.

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