
मिडिल ईस्ट में चल रही जंग सिर्फ मिसाइलों और ड्रोन की कहानी नहीं है। असली धमाका तो उन देशों की अर्थव्यवस्था में हो रहा है जो खाड़ी के तेल पर टिके हुए हैं।
पिछले दो हफ्तों से अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। भारत में LPG को लेकर बेचैनी है, लेकिन पाकिस्तान में हालात कहीं ज्यादा गंभीर होते दिख रहे हैं।
तेल महंगा हुआ तो सरकार की सांस फूल गई… और नतीजा सीधे कर्मचारियों की तनख्वाह पर गिरा।
पीएम शहबाज शरीफ का बड़ा फैसला
आर्थिक दबाव के बीच प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने सरकारी दफ्तरों में खलबली मचा दी।
सरकार ने सरकारी कंपनियों और स्वायत्त संस्थाओं के कर्मचारियों के वेतन में 5 से 30 प्रतिशत तक कटौती को मंजूरी दे दी है। यह निर्णय एक उच्च स्तरीय बैठक में लिया गया, जहां तेल की कीमतों में उछाल से पैदा हुए आर्थिक संकट पर चर्चा हुई। सरकार का तर्क है कि यह कदम अस्थायी है, लेकिन कर्मचारियों के लिए यह सीधे जेब पर पड़ा वार है।
पेट्रोल के झटके ने बजट हिला दिया
दरअसल, हाल ही में पाकिस्तान में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में प्रति लीटर लगभग 55 रुपये की भारी बढ़ोतरी हुई है। तेल के इस झटके ने सरकार का पूरा बजट गणित बिगाड़ दिया।
इसी वजह से सरकार ने खर्च घटाने के लिए कई सख्त फैसले एक साथ लागू कर दिए। सरकारी बयान में कहा गया कि यह कटौती सरकारी कर्मचारियों के वेतन ढांचे के अनुरूप ही लागू की जा रही है।
सरकारी गाड़ियों पर भी ‘ब्रेक’
सिर्फ तनख्वाह ही नहीं, सरकार ने खर्च कम करने के लिए सरकारी मशीनरी पर भी ब्रेक लगा दिया है।
निर्णय के मुताबिक सरकारी वाहनों के ईंधन आवंटन में 50% कटौती होगी। अगले दो महीनों में 60% सरकारी गाड़ियां सड़कों से हटाई जाएंगी। नई सरकारी गाड़ियों की खरीद पूरी तरह रोक दी गई है।
इसकी निगरानी के लिए थर्ड-पार्टी ऑडिट की व्यवस्था भी लागू की जा रही है।

विदेश यात्राओं पर भी ताला
सरकार ने खर्च कम करने के लिए एक और सख्त कदम उठाया है। कैबिनेट मंत्रियों, सलाहकारों और विशेष सहायकों की विदेश यात्राओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया गया है।
इतना ही नहीं, अगले दो महीनों की उनकी तनख्वाह भी “जन-कल्याण बचत” के नाम पर सरकारी फंड में डाली जाएगी।
सुनने में यह कदम सादगी का संदेश देता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि असली बोझ फिर भी कर्मचारियों और आम जनता पर ही पड़ रहा है।
असली वजह: तेल पर भारी निर्भरता
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से खाड़ी देशों के तेल पर निर्भर रही है। मिडिल ईस्ट में जंग छिड़ते ही सप्लाई चेन में डर पैदा हो गया और तेल की कीमतें ऊपर चढ़ने लगीं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संघर्ष लंबा चला तो पाकिस्तान जैसे आयात-निर्भर देशों के लिए आर्थिक संकट और गहरा सकता है।
सवाल: संकट कब थमेगा?
सरकार कह रही है कि वेतन कटौती से बचने वाला पैसा जन कल्याण में खर्च होगा। लेकिन आम कर्मचारियों के बीच एक ही सवाल घूम रहा है
अगर तेल का संकट लंबा चला… तो क्या अगला कदम और बड़ी कटौती होगा?
मिडिल ईस्ट की जंग से उठी यह आर्थिक लहर अब साफ दिखा रही है कि वैश्विक राजनीति का झटका सबसे पहले आम लोगों की जेब पर पड़ता है।
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