
मिडिल ईस्ट में चल रही जंग सिर्फ मिसाइलों और ड्रोन की कहानी नहीं है। इसकी लपटें अब भारत के बंदरगाहों तक पहुंचने लगी हैं।
समुद्र में तनाव इतना बढ़ गया है कि भारत से गल्फ देशों के लिए भेजी गई करीब 2000 हुंडई कारों को वापस लाने की तैयारी की जा रही है।
हाँ, वही कारें जो कुछ दिन पहले एक्सपोर्ट के लिए रवाना हुई थीं, अब शायद चेन्नई के तट पर वापस उतरती दिखेंगी।
कारण साफ है समुद्र में युद्ध का डर। जहां कभी कंटेनर जहाजों की कतारें दिखती थीं, अब वहां युद्धपोतों की छाया तैर रही है।
समुद्री रास्तों पर युद्ध का साया
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और लाल सागर जैसे अहम समुद्री रास्तों को असुरक्षित बना दिया है। यही वे रास्ते हैं जिनसे भारत का अरब देशों के साथ सबसे बड़ा व्यापार चलता है। लेकिन अब शिपिंग कंपनियां इन मार्गों पर जहाज भेजने से पहले दस बार सोच रही हैं। कई जहाजों को बीच रास्ते से वापस मोड़ दिया गया है। कुछ ने रूट बदल दिया है।
समुद्र की इस अनिश्चितता ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार को ऐसे जकड़ लिया है जैसे किसी ने अचानक ग्लोबल सप्लाई चेन का ब्रेक खींच दिया हो।
हजारों कंटेनर रास्ते में अटक गए
रिपोर्ट्स के मुताबिक हालात इतने बिगड़ गए हैं कि करीब 4000 कंटेनर अपने तय रास्तों से वापस मोड़े जा चुके हैं। इनमें से लगभग 1800 कंटेनर चेन्नई से भेजे गए थे। तमिलनाडु के कई बंदरगाहों से शिपमेंट की रफ्तार भी धीमी पड़ गई है।
खास तौर पर वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट (थूथुकुडी) जो गल्फ देशों के लिए एक बड़ा एक्सपोर्ट हब माना जाता है, वहां से जाने वाले कई कार्गो शिपमेंट में देरी हो रही है। समुद्र का रास्ता अगर बंद हो जाए तो बंदरगाह सिर्फ गोदाम बनकर रह जाते हैं। और फिलहाल वही होता दिख रहा है।
2000 Hyundai कारों की वापसी की तैयारी
इस संकट का सबसे बड़ा झटका भारत के ऑटोमोबाइल एक्सपोर्ट सेक्टर को लग सकता है। सूत्रों के मुताबिक गल्फ बाजारों के लिए भेजी गई करीब 2000 Hyundai कारों को वापस भारत लाने की तैयारी चल रही है। अगर सुरक्षा जोखिम बढ़ता है तो इन कारों को चेन्नई पोर्ट पर ही उतार दिया जाएगा। यह सिर्फ एक कंपनी की कहानी नहीं है।

यह उस बड़े एक्सपोर्ट नेटवर्क की झलक है जो मिडिल ईस्ट पर निर्भर है।
भारत, जापान, चीन और दक्षिण कोरिया हर साल अरबों डॉलर की कारें इस क्षेत्र में भेजते हैं। जंग अगर लंबी चली, तो यह पूरा कारोबार हिल सकता है।
पोर्ट प्रशासन अलर्ट मोड में
चेन्नई पोर्ट अथॉरिटी और अन्य बंदरगाह प्रशासन ने हालात को देखते हुए वैकल्पिक तैयारी शुरू कर दी है। जरूरत पड़ने पर करीब 20,000 वर्ग मीटर का अस्थायी स्टोरेज यार्ड बनाया जा सकता है ताकि लौटने वाले कंटेनरों और कार्गो को रखा जा सके।
पोर्ट अधिकारियों और एक्सपोर्टर्स के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं।
एक ही सवाल बार-बार उठ रहा है अगर समुद्र असुरक्षित हो जाए तो व्यापार जाएगा कहां?
जंग सिर्फ सीमाओं पर नहीं, अर्थव्यवस्था पर भी लड़ी जाती है
दुनिया की हर बड़ी जंग का पहला असर बाजार पर पड़ता है। मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष भी उसी रास्ते पर बढ़ रहा है। जहां मिसाइलें आसमान में उड़ रही हैं, वहीं नीचे समुद्र में व्यापार ठहरने लगा है। और अगर यह संकट लंबा चला तो भारत का एक्सपोर्ट, ऑटो सेक्टर और सप्लाई चेन
तीनों को भारी झटका लग सकता है।
युद्ध की असली कीमत अक्सर वही लोग चुकाते हैं जो युद्ध में शामिल भी नहीं होते।
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