
महाराष्ट्र में राज्यसभा और विधान परिषद के आगामी चुनाव ने सियासी पारा बढ़ा दिया है। सात राज्यसभा सीटों में से छह पर NDA की बढ़त मानी जा रही है, जिससे विपक्षी गठबंधन महा विकास अघाड़ी (MVA) के लिए केवल एक सीट की संभावनाएं बचती हैं।
MVA में शामिल Shiv Sena (UBT), Nationalist Congress Party (Sharad Pawar faction) और Indian National Congress के बीच इसी एक सीट को लेकर समीकरण जटिल होते दिख रहे हैं।
36 वोट का फॉर्मूला, लेकिन सीट सिर्फ एक
राज्यसभा की हर सीट जीतने के लिए 36 वोटों की जरूरत है। विधानसभा में मौजूदा संख्या बल के हिसाब से MVA आराम से एक सीट निकाल सकता है।
लेकिन सवाल यह है — उस सीट पर दावा किसका?
- शिवसेना (UBT) के 20 विधायक
- कांग्रेस के 16 विधायक
- एनसीपी (SP) के 10 विधायक
कुल मिलाकर 46 का आंकड़ा, जो एक सीट के लिए पर्याप्त है लेकिन महत्वाकांक्षाएं गणित से बड़ी हो जाएं तो राजनीति दिलचस्प हो जाती है।
दिल्ली की उड़ान और अंदरूनी सिग्नल
रिपोर्ट्स के मुताबिक, Uddhav Thackeray कांग्रेस नेतृत्व से चर्चा के लिए दिल्ली जा सकते हैं। यह संकेत है कि सीट शेयरिंग को लेकर अंतिम फैसला केंद्रीय स्तर पर होगा।
इधर, Sanjay Raut ने गठबंधन में दरार की खबरों को खारिज किया है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में फुसफुसाहट जारी है। Sharad Pawar का कार्यकाल भी पूरा हो रहा है, जिससे समीकरण और संवेदनशील हो गए हैं।
NDA का मजबूत पलड़ा
2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में NDA की शानदार जीत ने समीकरण बदल दिए। सात में से छह सीटें NDA के खाते में जाती दिख रही हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव सिर्फ सीट का नहीं, बल्कि विपक्ष की एकजुटता की परीक्षा भी है।

विधान परिषद का अलग समीकरण
राज्यसभा के साथ ही विधान परिषद की नौ सीटें भी खाली हो रही हैं। हर सीट के लिए 29 वोट चाहिए। MVA यहां भी कम से कम एक सीट सुरक्षित निकाल सकता है।
लेकिन क्या राज्यसभा और परिषद की सीटों के बीच “समझौता फार्मूला” बनेगा? यही असली टेस्ट है।
गठबंधन में गणित बनाम महत्वाकांक्षा
भारतीय राजनीति में गठबंधन का गणित अक्सर एक्सेल शीट में फिट बैठता है, लेकिन जमीन पर “इगो मैनेजमेंट” ज्यादा बड़ा फैक्टर बन जाता है।
एक सीट — तीन दावेदार — और दिल्ली दरबार की तरफ उठती निगाहें। सवाल यह है कि MVA इस परीक्षा को रणनीति से पास करेगा या आंतरिक खींचतान उसे कमजोर करेगी?
यह चुनाव केवल एक सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि 2029 की तैयारी का संकेत भी हो सकता है। महाराष्ट्र की सियासत में यह छोटा चुनाव बड़े संदेश दे सकता है।
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