माया का प्रहार- PDA सिर्फ वोट का जुगाड़, कांशीराम को भारत रत्न की मांग

महेंद्र सिंह
महेंद्र सिंह

लखनऊ की सुबह। बसपा कार्यालय के बाहर नीले झंडों की कतारें, पोस्टरों पर एक चेहरा और कार्यकर्ताओं के बीच एक नाम बार-बार गूंज रहा था। वह नाम है Kanshi Ram

उनकी जयंती पर बसपा कार्यकर्ताओं ने सिर्फ श्रद्धांजलि नहीं दी, बल्कि उस आंदोलन की याद भी ताजा की जिसने भारत की सामाजिक राजनीति को नया मोड़ दिया था।

इस मौके पर बसपा सुप्रीमो Mayawati ने बहुजन समाज से एकजुट होने की अपील की और साथ ही राजनीतिक विरोधियों पर तीखा हमला भी बोला।

‘बहुजन आंदोलन सिर्फ नारा नहीं, मिशन है’

मायावती ने कहा कि कांशीराम का पूरा जीवन बहुजन समाज के उत्थान और सामाजिक न्याय के मिशन के लिए समर्पित रहा।

उन्होंने कहा कि B. R. Ambedkar के विचारों को राजनीतिक शक्ति में बदलने का काम कांशीराम ने किया। उनके अनुसार बहुजन समाज को संगठित कर उसे एक मजबूत राजनीतिक ताकत बनाना भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांतियों में से एक था।

बसपा प्रमुख ने कहा कि पार्टी आज भी उसी मिशन को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित है।

सपा पर तीखा हमला, ‘PDA’ को बताया चुनावी जुमला

अपने संबोधन में मायावती ने सपाध्यक्ष Akhilesh Yadav और उनकी पार्टी पर अप्रत्यक्ष हमला करते हुए कहा कि कई दल बहुजन समाज के हितों की बात तो करते हैं, लेकिन उनकी राजनीति सिर्फ चुनाव तक सीमित रहती है।

उन्होंने खास तौर पर ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारे को निशाने पर लिया। मायावती ने कहा कि यह नारा असल में चुनावी गणित का फार्मूला है, सामाजिक न्याय का नहीं।

उनका तंज साफ था “चुनाव के समय बहुजन समाज की याद आती है, लेकिन सत्ता मिलने के बाद वही समाज सबसे पहले भुला दिया जाता है।”

बहुजन एकता और बदलते राजनीतिक समीकरण

बसपा सुप्रीमो ने दावा किया कि धीरे-धीरे कई समुदायों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज का कई दलों से मोहभंग हो रहा है और ब्राह्मण समाज का समर्थन भी धीरे-धीरे बसपा की ओर बढ़ रहा है।

राजनीतिक विश्लेषक सुरेंद्र दुबे के अनुसार यह बयान आने वाले चुनावों के लिए सामाजिक समीकरण बनाने का संकेत भी माना जा रहा है।

क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय और सामाजिक गठजोड़ ही अक्सर चुनावी परिणाम तय करते हैं।

‘मास्टर चाबी’ की राजनीति

मायावती ने बहुजन समाज से अपील की कि वे बसपा के साथ जुड़कर अपने वोट की ताकत को समझें। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज के पास सत्ता की “मास्टर चाबी” है और अगर समाज संगठित हो जाए तो राजनीतिक तस्वीर बदल सकती है।

यह बयान दरअसल बसपा की पुरानी रणनीति की याद दिलाता है जहां सामाजिक एकता को राजनीतिक शक्ति में बदलने की बात बार-बार कही जाती रही है।

कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग

जयंती के अवसर पर मायावती ने केंद्र सरकार से मांग की कि कांशीराम के योगदान को देखते हुए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना चाहिए। उनका कहना था कि सामाजिक न्याय और बहुजन आंदोलन के लिए कांशीराम का योगदान ऐतिहासिक है और उसे राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलना चाहिए।

इस मौके पर लखनऊ के 9 माल एवेन्यू स्थित बसपा मुख्यालय और नोएडा के राष्ट्रीय दलित प्रेरणा स्थल पर बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने पहुंचकर कांशीराम को श्रद्धांजलि दी।

कांशीराम जयंती का यह आयोजन सिर्फ श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं था। यह आने वाले चुनावों के लिए एक राजनीतिक संदेश भी था। बसपा ने साफ संकेत दिया कि वह अभी भी खुद को बहुजन आंदोलन की असली राजनीतिक आवाज मानती है। और भारतीय राजनीति में एक सच हमेशा कायम रहता है जयंती और पुण्यतिथि सिर्फ इतिहास नहीं होतीं, वे भविष्य की राजनीति भी लिखती हैं।

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