मनमोहन के राज में हुई थी यूरोपीय संघ से व्यापार वार्ता, लगे 18 साल?

सैफी हुसैन
सैफी हुसैन, ट्रेड एनालिस्ट

18 साल ! इतने साल में सरकारें बदल जाती हैं, पीढ़ियां बड़ी हो जाती हैं, और भारत में तो एक्सप्रेसवे तक बन जाते हैं।
लेकिन India–EU Trade Deal को पूरा होने में पूरे 18 साल लगे — और जब आखिरकार डील साइन हुई, तो लगा जैसे यूरोप ने शादी के लिए “अब हम तैयार हैं” कह दिया हो।

यह कोई मामूली समझौता नहीं है। यह उस रिश्ते का ऑफिशियल एलान है, जिसमें भारत अब सिर्फ emerging market नहीं, बल्कि decision-making table पर बैठा partner है।

यूरोप को समझने में 18 साल क्यों लगे?

यूरोपीय संघ चाहता था, “India, open your markets, cut tariffs, follow our standards.”

भारत ने जवाब दिया , “Fine, but my farmers are not experimental subjects.”

यहीं से बात अटक गई। EU को cheap access चाहिए था, भारत को strategic respect

जिस यूरोप ने दुनिया को free trade का पाठ पढ़ाया, वही भारत के साथ बातचीत में 27 देशों की सहमति और संसद की मंजूरी के चक्कर में खुद फँसा रहा।

Deal से फायदा किसे? जवाब: सबको, लेकिन अलग-अलग मूड में

  1. Indian Industry खुश है — Export बढ़ेगा
  2. Consumers खुश हैं — BMW, Mercedes, Wine सस्ती होगी
  3. IT Professionals खुश हैं — Europe जाने का रास्ता आसान
  4. Farmers राहत में हैं — डेयरी और कृषि सेक्टर सुरक्षित

और सबसे ज्यादा खुश है — Indian Negotiating Team, जिसने 18 साल तक “ना” कहने की stamina दिखाई।

ये सिर्फ Trade Deal नहीं, Power Signal है

आज की दुनिया में Trade Deal मतलब सिर्फ बिजनेस नहीं होता, मतलब होता है — किसके साथ खड़े हो

EU और भारत का करीब आना यह दिखाता है कि China-centric supply chains से दूरी। Strategic autonomy की तलाश। Defence और Security में भरोसा। यानि पैसा, पॉलिटिक्स और पावर — तीनों एक साथ।

असली परीक्षा अब शुरू होगी

Deal साइन होना आसान हिस्सा था। असली सवाल है — Implementation

भारत में हम घोषणाओं में वर्ल्ड क्लास हैं, लेकिन फाइलें आज भी “Under Process” में फँस जाती हैं। अगर Bureaucracy ने speed पकड़ी। Industry ने quality सुधारी। Policy ने consistency रखी तो यह डील इतिहास बनेगी। वरना यह भी एक और फाइल बनकर रह जाएगी — “Signed but Not Used”.

India–EU Trade Deal यह बताता है कि भारत अब rule-taker नहीं, rule-negotiator है। 18 साल देर से सही, लेकिन जब भारत और यूरोप मिले हैं तो यह सिर्फ handshake नहीं, global economics का tectonic shift है।

अब सवाल यह नहीं कि यूरोप भारत को कितना देगा, सवाल यह है कि भारत इस मौके से कितना निकाल पाएगा

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