
प्रदेश में स्वच्छ भारत अभियान के पोस्टर चमक रहे हैं, भाषण गूंज रहे हैं और दावे आसमान छू रहे हैं। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और कहानी कहती है।
लखनऊ के दिल कहे जाने वाले हजरतगंज की एक प्रमुख पार्किंग में कूड़े का ढेर लगा है। तस्वीरें साफ बता रही हैं कि सफाई के दावे और सच्चाई के बीच दूरी अभी भी बरकरार है।
VIP इलाका, लेकिन हाल आम से भी बदतर?
चौंकाने वाली बात ये है कि यह पार्किंग मुख्यमंत्री आवास, राजभवन, जिलाधिकारी आवास और नगर निगम कार्यालय से कुछ ही कदमों की दूरी पर है। यानी प्रशासनिक नब्ज जहां से चलती है, वहां की सांस ही अटकी हुई नजर आ रही है। अगर राजधानी के सबसे संवेदनशील इलाके का यह हाल है, तो बाकी शहरों की हालत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।
Tourist Spot या Trash Spot?
हजरतगंज वो इलाका है जहां देश-विदेश से आने वाले पर्यटक रोज़ाना घूमने आते हैं। अब जरा सोचिए जब विदेशी पर्यटक कैमरा क्लिक करते होंगे, तो तस्वीर में heritage दिखता होगा या heap of garbage?
Local लोग शायद अब मुस्कराकर आगे बढ़ जाते हों, लेकिन बाहर से आने वालों के लिए यह पहली छाप बनती है और पहली छाप अक्सर आखिरी बन जाती है।
Swachh Bharat: Vision vs Ground Reality
स्वच्छ भारत मिशन का उद्देश्य साफ-सुथरा भारत बनाना है, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन सवाल यह है क्या निगरानी व्यवस्था प्रभावी है?
क्या जिम्मेदार विभागों की जवाबदेही तय है? क्या VIP इलाकों की सफाई भी प्राथमिकता में है या सिर्फ कागज़ों पर? बयान बड़े हैं, बैनर चमकदार हैं लेकिन सफाई ज़मीन पर दिखनी चाहिए, स्लोगन में नहीं।

Public Accountability जरूरी
सफाई सिर्फ नगर निगम की जिम्मेदारी नहीं, नागरिकों की भी है। लेकिन जहां कूड़ा दिनों तक पड़ा रहे, वहां सिस्टम पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
हजरतगंज जैसी जगह अगर अपनी दुर्दशा पर “रो” रही है, तो यह सिर्फ एक लोकल इश्यू नहीं प्रशासनिक मैसेज भी है।
राजधानी की सड़कों पर स्वच्छता का आईना साफ होना चाहिए। क्योंकि जब दिल ही मैला दिखे, तो शरीर की सेहत पर भरोसा करना मुश्किल हो जाता है।
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