जो बचाने आया था, वही खेल गया! Insolvency Process बना Cash Machine

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने यह जांच CBI द्वारा दर्ज एफआईआर के आधार पर शुरू की है। आरोप है कि 2015 से 2018 के बीच आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के जरिए पब्लिक सेक्टर बैंकों को करीब ₹236 करोड़ का नुकसान पहुंचाया गया।

जांच के केंद्र में हैं अरविंद कुमार, जो उस समय Resolution Professional (RP) की भूमिका में थे।
ED का दावा है कि उन्होंने IBC के तहत मिली जिम्मेदारी को भरोसे की बजाय बिज़नेस मॉडल बना लिया।

Insolvency या Inside Job?

ED की जांच में सामने आया है कि CIRP (Corporate Insolvency Resolution Process) के दौरान कंपनी के फंड्स को layered transactions के जरिए उन व्यक्तियों और फर्मों तक पहुंचाया गया जो सीधे या परोक्ष रूप से अरविंद कुमार से जुड़े बताए जा रहे हैं।

“कंपनी डूब रही थी, लेकिन पैसे तैरते हुए सही जगह पहुंच रहे थे।”

कैसे हुआ पैसों का गोलमाल

ED के मुताबिक, कंपनी से भुगतान पहले करीबी लोगों/फर्मों को किया गया फिर वही रकम घूम-फिरकर निजी खातों में पहुंची।

बैंक रिकॉर्ड बताते हैं कि इस दौरान ₹80 लाख से ज्यादा नकद जमा। ₹1 करोड़ से अधिक की राशि उन्हीं लोगों से आई जिन्हें पहले कंपनी से पेमेंट मिला था।

यानि रास्ता लंबा था, लेकिन मंज़िल तय।

ED ने कौन-कौन सी गड़बड़ियां गिनाईं?

जांच में कई गंभीर आरोप सामने आए हैं, जिनमें शामिल हैं जानबूझकर फर्जी और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए दावों को मानकर अवैध CoC बनाना। प्रमोटरों से जुड़े लोगों को सब-कॉन्ट्रैक्ट, सैलरी और ऑपरेशनल खर्च के नाम पर करोड़ों का भुगतान। निलंबित प्रमोटरों को पर्दे के पीछे से कंपनी चलाने देना। IBC के तहत जरूरी Avoidance Applications दाखिल न करना। प्रमोटर परिवार की कंपनियों द्वारा दिए गए अयोग्य Resolution Plans को आगे बढ़ाना। कंपनी या उसकी संपत्ति बेचने के नाम पर बिना अनुमति करोड़ों की वसूली।

सीधा सवाल उठता है RP कंपनी के लिए था या प्रमोटरों के लिए?

बैंकों को 94% तक का नुकसान

ED का कहना है कि इस कथित “Pro-Promoter Conspiracy” की वजह से बैंकों को लगभग 94% का झटका लगा। बैंकों के कुल दावे: ₹708 करोड़, लिक्विडेशन के बाद मिला: सिर्फ ₹40 करोड़।

बाकी पैसा? फाइलों और ट्रांजैक्शन लेयर्स में कहीं गुम।

पहले भी हो चुकी है कार्रवाई

यह पहला मौका नहीं है जब अरविंद कुमार पर सवाल उठे हों। इससे जुड़े उल्लंघनों को लेकर IBBI (Insolvency and Bankruptcy Board of India) पहले ही उनका रजिस्ट्रेशन दो साल के लिए सस्पेंड कर चुका है। मतलब सिस्टम ने देर से सही, लेकिन खतरे की घंटी पहले ही बजा दी थी।

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