हर बात पर आँसू, हर किसी पर दोष—शास्त्र भी परेशान, साइकोलॉजी भी!

महिमा बाजपेई
महिमा बाजपेई

सोशल मीडिया और घरेलू बहसों में इन दिनों एक सवाल ट्रेंड कर रहा है—हर बात पर रोने और हर हाल में दूसरों को कोसने वाली स्त्री को शास्त्रों और मनोविज्ञान में क्या कहा गया है?
यह सवाल सिर्फ व्यंग्य नहीं, बल्कि व्यवहारिक अध्ययन और मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ा है।

शास्त्र क्या कहते हैं? (Scriptural Perspective)

शास्त्र किसी स्त्री जाति को नहीं, बल्कि वृत्ति (Behavioral Trait) को नाम देते हैं।

मनुस्मृति से भावार्थ

“असंतोषोऽधर्ममूलं, दोषदर्शी न शान्तिभाक्।”

जो व्यक्ति सदैव असंतुष्ट रहता है और दोष ही खोजता है, वह स्वयं कभी शांति नहीं पा सकता।

यहाँ लिंग नहीं, स्वभाव पर प्रहार है।

चाणक्य नीति

“अतिवादः अतिशोकश्च, गृहभङ्गस्य कारणम्।”

अत्यधिक बोलना और अत्यधिक शोक—दोनों घर को तोड़ देते हैं।

शास्त्र ऐसी प्रवृत्ति को “दोषदर्शिनी वृत्ति” कहते हैं।

मनोविज्ञान क्या कहता है? (Psychology View)

Modern psychology इस व्यवहार को कुछ टर्म्स में समझाती है:

Chronic Victim Mindset

हर स्थिति में खुद को पीड़ित मानना और दूसरों को दोषी ठहराना।

Emotional Dysregulation

भावनाओं पर नियंत्रण की कमी—रोना coping mechanism बन जाता है।

Learned Helplessness

बार-बार की निराशा से व्यक्ति मान लेता है कि सब गलती दूसरों की है

Note: यह traits gender-neutral हैं, लेकिन सामाजिक कारणों से स्त्रियों में अधिक दिख सकते हैं।

“इनका रिमोट हमेशा ‘Emotional Drama Mode’ पर रहता है— बैटरी खत्म हो जाए, तब भी ब्लेम पड़ोसी पर!”

सटायर का उद्देश्य अपमान नहीं, बल्कि आत्ममंथन है।

समाज और समाधान

 Emotional literacy
 Open communication
 Therapy ≠ weakness
 दोषारोपण से ज़्यादा समाधान पर फोकस

शास्त्र हों या साइकोलॉजी—दोनों यही कहते हैं कि रोना समस्या नहीं, लेकिन हर बात पर रोकर दूसरों को कोसना आत्मविकास की सबसे बड़ी रुकावट है। और यह बात स्त्री-पुरुष से ऊपर, इंसानी स्वभाव की है।–

हर बात पर रोना और दूसरों को कोसना दरअसल अंदर की असहायता की आवाज़ है।

इलाज गुस्से में नहीं, समझ, अभ्यास और थोड़े humor में छुपा है।

जो खुद को सुधार लेता है, उसे दुनिया को कोसने की ज़रूरत नहीं पड़ती।

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