दरिंदगी पर ड्रैगन का प्रहार: क्या मौत की सजा ही आखिरी जवाब है?

संजीव पॉल
संजीव पॉल

China ने बाल यौन शोषण और दुष्कर्म जैसे अपराधों पर सख्त रुख दोहराते हुए स्पष्ट किया है कि सबसे गंभीर मामलों में मौत की सजा दी जा सकती है। हाल के समय में कई दोषियों को, जिनकी सजा को Supreme People’s Court ने मंजूरी दी, फांसी दी गई।

यह कदम सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है “बच्चों के खिलाफ अपराध पर कोई नरमी नहीं।”

कानूनी ढांचा: कब मिलती है Death Penalty?

चीन के आपराधिक कानून में हर मामला सीधे फांसी तक नहीं जाता। लेकिन यदि अपराध में बार-बार शोषण, गंभीर शारीरिक या मानसिक क्षति या अत्यंत क्रूर परिस्थितियाँ शामिल हों, तो अदालतें ‘maximum punishment’ का सहारा ले सकती हैं।

यहां प्रक्रिया बहु-स्तरीय है। स्थानीय अदालत के फैसले के बाद उच्च अदालत और अंततः Supreme People’s Court की समीक्षा अनिवार्य होती है।

न्याय या नजीर? Global Debate तेज

पूंजी दंड (capital punishment) को लेकर दुनिया दो हिस्सों में बंटी है। कुछ देशों का मानना है कि ऐसे जघन्य अपराधों के लिए कठोरतम सजा ही निवारक (deterrent) साबित होती है। दूसरी ओर, मानवाधिकार समूह इसे न्यायिक त्रुटि और पारदर्शिता के सवालों से जोड़ते हैं।

दुनिया ‘human rights’ पर सेमिनार करती है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा पर अक्सर एकजुट आवाज कम सुनाई देती है।

Zero Tolerance: Symbolism या Systemic Reform?

सवाल सिर्फ मौत की सजा का नहीं है। क्या सख्ती से अपराध रुकते हैं? या फिर जरूरी है बेहतर child protection systems, जागरूकता और तेज़ जांच तंत्र?

कानून का डर जरूरी है, लेकिन समाज की जिम्मेदारी उससे भी ज्यादा।

एशिया बनाम पश्चिम: दृष्टिकोण का अंतर

कई एशियाई देश कठोर दंड व्यवस्था को सामाजिक स्थिरता का हिस्सा मानते हैं। वहीं यूरोप में अधिकतर देशों ने death penalty समाप्त कर दी है। चीन का मॉडल राज्य-संचालित अनुशासन और सख्त संदेश पर आधारित है जहां ‘zero tolerance’ सिर्फ स्लोगन नहीं, सजा की सीमा तक जाता है।

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चीन का यह रुख स्पष्ट करता है कि बाल यौन अपराधों को लेकर वहां कोई नरमी नहीं। लेकिन वैश्विक स्तर पर बहस जारी है क्या कठोरतम दंड ही सबसे प्रभावी समाधान है, या रोकथाम और पुनर्वास पर ज्यादा जोर होना चाहिए?

एक बात निर्विवाद है बच्चों की सुरक्षा पर समझौता नहीं होना चाहिए—चाहे कानून का तरीका अलग-अलग क्यों न हो।

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