
मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, लेकिन मेयर की कुर्सी अब भी अधर में है।
भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 29 सीटें मिली हैं। गणित के हिसाब से सत्ता करीब दिखती है, लेकिन मुंबई की राजनीति गणित से नहीं, तकनीक से चलती है।
‘Mayor Lottery’ – जहां खेल पलट जाता है
मुंबई में मेयर कौन बनेगा, यह सिर्फ सीटों की संख्या तय नहीं करती। यह फैसला होता है एक आरक्षण लॉटरी से, जिसे नगर विकास विभाग निकालता है।
यह लॉटरी तय करती है कि मेयर पद— महिला, OBC, SC या ST में से किस श्रेणी के लिए आरक्षित होगा।
क्योंकि पिछली मेयर किशोरी पेडनेकर सामान्य वर्ग से थीं, इसलिए इस बार मेयर पद का आरक्षित होना तय है। असली ट्विस्ट गुरुवार को सामने आएगा, जब लॉटरी खुलेगी।
उद्धव ठाकरे का ‘Hidden Trump Card’
15 जनवरी को हुए BMC चुनाव में—
- कुल सीटें: 227
- ST के लिए आरक्षित सीटें: सिर्फ 2
इन दोनों ST सीटों पर शिवसेना (UBT) के उम्मीदवार—
- जितेंद्र वालवी
- दीपमाला बबन बढ़े
जीतकर आए हैं।
BJP और शिंदे गुट के पास एक भी ST पार्षद नहीं है।

अगर ST निकला… तो क्या होगा?
अगर मेयर पद अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हो गया BJP उम्मीदवार नहीं उतार पाएगी। Shinde Sena के पास भी विकल्प नहीं होगा। सिर्फ उद्धव ठाकरे गुट ही दावेदारी पेश कर सकेगा। यानी सीटें कम होने के बावजूद मेयर की कुर्सी सीधी मातोश्री तक जा सकती है।
‘मराठी मेयर’ फैक्टर
दोनों ST पार्षद मराठी समुदाय से आते हैं। मुंबई की राजनीति में ‘मराठी मेयर’ का मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जाता है।
ऐसी स्थिति में खुला विरोध राजनीतिक जोखिम बन सकता है। कोई भी पार्टी ‘मराठी चेहरे’ के खिलाफ खुलकर खड़ी नहीं होना चाहेगी। यहीं से सियासी दबाव का असली खेल शुरू होता है।
लेकिन मुंबई में ST आबादी कम है। इसलिए ST आरक्षण निकलने की संभावना कम रहती है। लेकिन राजनीति में एक बात तय है— संभावना छोटी हो सकती है, लेकिन असर बहुत बड़ा।
सीटें गिनते-गिनते थक गए नेता, और उधर एक पर्ची तय कर दे— मुंबई का अगला मेयर कौन।
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