
कभी-कभी सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं करता, सीधे पेट में मुक्का मार देता है। 1980 की फिल्म Albert Pinto Ko Gussa Kyun Aata Hai ऐसी ही सिनेमाई चोट है। यहाँ हीरो बंदूक नहीं उठाता, बस गुस्सा करता है… और उसका गुस्सा इतना असली है कि आज भी स्क्रीन से निकलकर सीधे व्यवस्था की कॉलर पकड़ लेता है।
गुस्से का मैकेनिक: कहानी जो आज भी चुभती है
फिल्म में Naseeruddin Shah अल्बर्ट पिंटो बने हैं, मुंबई का एक युवा कार मैकेनिक। वह उन मजदूरों से नाराज़ रहता है जो हड़ताल करते हैं। क्योंकि उसे लगता है कि मेहनत करो, अमीरों की तरह सोचो… और एक दिन तुम भी अमीर बन जाओगे।
लेकिन कहानी तब पलटती है जब उसके पिता, जो मिल मजदूर हैं, सिस्टम की मार झेलते हैं। यहीं से पिंटो की आँखें खुलती हैं और उसका गुस्सा दिशा बदल लेता है।
जब सिनेमा ने पूंजीवाद की कॉलर पकड़ी
Saeed Akhtar Mirza का निर्देशन किसी मसाला फिल्म की तरह शोर नहीं करता। यह फिल्म धीरे-धीरे आपको उस शहर में घुमाती है जहाँ मेहनतकश आदमी का सपना अक्सर अमीरों की कार के नीचे कुचल जाता है।
फिल्म का सबसे बड़ा व्यंग यही है कि सिस्टम पहले मजदूर को भ्रम देता है…फिर उसी भ्रम के टूटने पर उसे गुस्सा भी दे देता है।
स्टार कास्ट: एक्टिंग नहीं, असली जिंदगी
इस फिल्म की ताकत इसकी कास्ट है।
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Naseeruddin Shah
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Shabana Azmi

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Smita Patil
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Om Puri
यह वो दौर था जब एक्टिंग कैमरे के लिए नहीं, समाज के लिए की जाती थी। इन कलाकारों ने किरदार नहीं निभाए, उन्हें जी लिया।
समानांतर सिनेमा का करारा थप्पड़
1980 का दौर हिंदी सिनेमा में समानांतर सिनेमा का था। और Albert Pinto Ko Gussa Kyun Aata Hai उस आंदोलन की सबसे तीखी फिल्मों में गिनी जाती है। यह फिल्म मनोरंजन के नाम पर पॉपकॉर्न नहीं देती यह सवाल देती है। और सवाल हमेशा खतरनाक होते हैं।
आज भी क्यों प्रासंगिक है यह फिल्म
अगर आप आज की खबरें देखें मजदूर बनाम पूंजीपति का संघर्ष अब भी खत्म नहीं हुआ। बस फर्क इतना है कि आज का अल्बर्ट पिंटो शायद कार गैराज में नहीं किसी ऐप के लिए काम कर रहा होगा। और उसका गुस्सा भी वही होगा।
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