नई दिल्ली: अगर भारत की सबसे खूबसूरत और अनोखी जगहों की बात हो, तो मेघालय का छोटा-सा गांव मावलिननॉन्ग जरूर चर्चा में आता है। प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ यह गांव अपनी बेमिसाल स्वच्छता के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। करीब 22 वर्षों से यह गांव एशिया के सबसे स्वच्छ गांवों में अपनी पहचान बनाए हुए है और आज भी साफ-सफाई के मामले में मिसाल माना जाता है।
मेघालय की राजधानी शिलांग से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित मावलिननॉन्ग को उसकी हरियाली और स्वच्छ वातावरण के कारण कई लोग “ईश्वर का अपना बगीचा” भी कहते हैं। यहां की सबसे बड़ी खासियत यह है कि गांव की सफाई के लिए किसी बड़े सरकारी तंत्र या सफाई कर्मचारियों पर निर्भरता नहीं है, बल्कि पूरा गांव मिलकर स्वच्छता की जिम्मेदारी निभाता है।
गांव की सोच बनी सबसे बड़ी ताकत
मावलिननॉन्ग की सफलता का सबसे बड़ा कारण यहां के लोगों की जीवनशैली और सोच है। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक हर व्यक्ति गांव को साफ रखने में अपनी भूमिका निभाता है। सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फेंकने की मनाही है और जगह-जगह बांस से बने डस्टबिन लगाए गए हैं। यही सामुदायिक भागीदारी इस गांव को वर्षों से स्वच्छ बनाए हुए है।
2003 में मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान
मावलिननॉन्ग को वैश्विक स्तर पर पहचान वर्ष 2003 में मिली, जब डिस्कवरी इंडिया पत्रिका ने इसे भारत का सबसे स्वच्छ गांव घोषित किया। इसके बाद यह गांव देश-विदेश के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया। हालांकि, स्थानीय लोगों के अनुसार गांव में स्वच्छता की यह परंपरा इससे भी कई वर्षों पहले से चली आ रही है।
खासी जनजाति की अनोखी परंपरा भी है खास
यह गांव खासी जनजाति की सांस्कृतिक विरासत के लिए भी प्रसिद्ध है। इस समुदाय में मातृसत्तात्मक व्यवस्था का पालन किया जाता है, जहां परिवार की मुखिया महिला होती है। संपत्ति का उत्तराधिकार भी परिवार की सबसे छोटी बेटी को दिया जाता है, जो इस समाज की विशिष्ट परंपरा मानी जाती है।
पर्यटकों के लिए बना पसंदीदा पर्यटन स्थल
साफ-सुथरी गलियां, हरियाली से घिरा प्राकृतिक वातावरण और स्थानीय संस्कृति का अनूठा मेल मावलिननॉन्ग को पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल करता है। हर वर्ष बड़ी संख्या में देश-विदेश से पर्यटक यहां की स्वच्छता और प्राकृतिक सुंदरता का अनुभव करने पहुंचते हैं।
