
भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में आज सबसे बड़ा सवाल यही है क्या बॉलीवुड अपनी चमक खो रहा है? एक दौर था जब हिंदी सिनेमा देशभर का ‘डिफॉल्ट एंटरटेनमेंट’ था। लेकिन पिछले कुछ सालों में Bollywood की कई बड़ी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर लड़खड़ाती दिखीं, जबकि South Indian cinema की फिल्में पैन-इंडिया हिट बन गईं।
कहानी गायब, ग्लैमर हाज़िर?
बॉलीवुड अक्सर “एक्स्ट्रा हाई-फाई फैमिली”, विदेशी लोकेशन और नामुमकिन प्लॉट के भरोसे फिल्में बेचने की कोशिश करता है। दर्शक अब सिर्फ स्टारडम नहीं, स्ट्रॉन्ग स्टोरी मांग रहा है।
जब कहानी कमजोर हो, तो VFX भी इमोशन नहीं बचा पाता।
साउथ का एक्सपेरिमेंट मॉडल
दूसरी ओर, साउथ सिनेमा लगातार एक्सपेरिमेंट कर रहा है। चाहे वह सामाजिक मुद्दों पर आधारित फिल्में हों, लोककथाओं से प्रेरित कथानक हों या फिर मजबूत पारिवारिक मूल्यों को दिखाने वाली कहानियां दर्शकों को कनेक्ट महसूस होता है। यहां हीरो सिर्फ सुपरह्यूमन नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से जुड़ा किरदार भी होता है।
परिवार, भावना और लोकल कनेक्ट
साउथ फिल्मों में ‘परिवार’ सिर्फ सेट डिजाइन का हिस्सा नहीं, कहानी का केंद्र होता है। रूटेड स्टोरीटेलिंग, लोकल फ्लेवर और सांस्कृतिक पहचान ये तीन चीजें साउथ को अलग बनाती हैं। जबकि बॉलीवुड अक्सर “अर्बन एलीट फैंटेसी” में उलझा दिखता है।

दर्शक बदल चुका है
OTT प्लेटफॉर्म्स के दौर में दर्शक का टेस्ट काफी परिपक्व हो गया है। अब वह लॉजिकलेस मसाला नहीं, बल्कि कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा चाहता है।
सवाल यह नहीं कि बॉलीवुड खत्म हो रहा है… सवाल यह है कि क्या वह खुद को रीइन्वेंट कर पाएगा?
मुकाबला नहीं, मंथन की जरूरत
यह बॉलीवुड बनाम साउथ की लड़ाई नहीं, बल्कि स्टोरीटेलिंग की क्वालिटी की बहस है। अगर हिंदी सिनेमा मजबूत स्क्रिप्ट, नए डायरेक्टर्स और रूटेड नैरेटिव पर ध्यान दे, तो वापसी नामुमकिन नहीं। आखिर दर्शक वही देखता है, जो दिल को छू जाए भाषा कोई भी हो।
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