30 दिन, 0 गिरफ्तारी: ‘डेथ बेसमेंट’ अब भी खुला! पिता ने देश छोड़ा

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

ग्रेटर नोएडा के सेक्टर 150 में हुई सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की दर्दनाक मौत को आज एक महीना पूरा हो चुका है। लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़े हैं न कोई गिरफ्तारी, न जांच रिपोर्ट सार्वजनिक, और न ही जिम्मेदारी तय।

16 जनवरी की रात युवराज की कार नाले की दीवार तोड़ते हुए पानी से भरे एक गहरे बेसमेंट में जा गिरी। रेस्क्यू ऑपरेशन में घंटों लगे, लेकिन जान नहीं बच सकी। उस हादसे ने ‘स्मार्ट सिटी’ के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

SIT रिपोर्ट का इंतज़ार… या सन्नाटा?

हादसे के बाद प्रशासन ने SIT गठित कर पांच दिन में रिपोर्ट देने का दावा किया था। मगर हफ्तों गुजर गए, रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई।

स्थानीय लोगों में यह चर्चा तेज है कि कहीं पर्दे के पीछे किसी प्रभावशाली नाम को बचाने की कोशिश तो नहीं?

“रिपोर्ट शायद उसी बेसमेंट में फंसी है, जहां कार फंसी थी।”

इंसाफ की आस टूटी, पिता विदेश रवाना

युवराज के पिता राजकुमार मेहता ने बेटे के लिए न्याय की लंबी लड़ाई शुरू की थी। लेकिन सिस्टम की सुस्ती ने उन्हें थका दिया। खबर है कि वे अब अपनी बेटी के पास लंदन चले गए हैं।

उनके घर के बाहर लटका ताला सिर्फ एक मकान का नहीं, बल्कि टूटे भरोसे का प्रतीक बन गया है। सवाल बड़ा है क्या एक पिता को इंसाफ की उम्मीद छोड़कर देश छोड़ना चाहिए था? या सिस्टम ने उन्हें मजबूर किया?

हादसे वाली जगह आज भी जोखिम भरी

ग्रेटर नोएडा में सेक्टर 150 की वह जगह आज भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही। कुछ बैरिकेड्स और रिफ्लेक्टर लगा दिए गए, लेकिन टूटी दीवार और जलभराव की समस्या जस की तस बताई जा रही है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि मिट्टी धंसने लगी है और गड्ढे बन गए हैं। आवारा पशु और राहगीर हर दिन जोखिम झेल रहे हैं।

हाई-फाई सोसायटी, लेकिन बेसिक सुरक्षा गायब

सेक्टर 150 को प्रीमियम रेजिडेंशियल ज़ोन के रूप में प्रचारित किया जाता है। लेकिन यह हादसा दिखाता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में छोटी चूक भी जानलेवा साबित हो सकती है। युवराज अब नहीं हैं, लेकिन उनकी मौत ने शहरी नियोजन, निगरानी और जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है।

न्याय में देरी, क्या न्याय से इनकार?

“Justice delayed is justice denied”—यह कहावत इस मामले में बार-बार दोहराई जा रही है। एक महीने बाद भी यदि रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होती, तो सवाल सिर्फ एक हादसे का नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही का भी है। ग्रेटर नोएडा प्रशासन के लिए यह सिर्फ एक केस नहीं, भरोसे की परीक्षा है।

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