
करीब डेढ़ साल की राजनीतिक अनिश्चितता के बाद बांग्लादेश में लोकतंत्र की नई तस्वीर उभरती दिख रही है। ताजा संसदीय चुनावों में Bangladesh Nationalist Party (BNP) ने जबरदस्त जीत दर्ज की है।
इस नतीजे के साथ 17 साल से विदेश में रह रहे तारिक रहमान के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता लगभग साफ हो गया है। सूत्रों के मुताबिक वे कल ही PM पद की शपथ ले सकते हैं।
चुनाव क्यों था ऐतिहासिक?
तीन दशकों में पहली बार Awami League का चुनावी प्रतीक ‘नाव’ मैदान में नहीं था। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और दिवंगत खालिदा जिया जैसे बड़े चेहरे इस बार चुनावी तस्वीर से बाहर रहे।
यह चुनाव “post-legacy politics” की शुरुआत हो सकता है — जहां नई पीढ़ी की पॉलिटिक्स पुराने समीकरणों को चुनौती दे रही है।
BNP का दबदबा
बीएनपी ने अकेले 209 सीटें जीतकर शानदार प्रदर्शन किया। सहयोगियों के साथ यह आंकड़ा 211 तक पहुंच गया — यानी दो-तिहाई बहुमत।
जमात और NCP पीछे
Jamaat-e-Islami Bangladesh को 68 सीटें और छात्र समर्थित NCP को सिर्फ 6 सीटें मिलीं।
299 सीटों पर ही मतदान
350 सदस्यीय संसद में 300 सीटों पर चुनाव होता है, लेकिन एक उम्मीदवार के निधन के कारण 299 सीटों पर ही वोटिंग हुई।
वोटिंग प्रतिशत 48%
अवामी लीग के बहिष्कार के बीच मतदान 48% रहा। विशेषज्ञों का कहना है कि कम वोटिंग के बावजूद राजनीतिक संदेश साफ है।
शेख हसीना भारत में
अगस्त 2024 से शेख हसीना भारत में रह रही हैं, जबकि खालिदा जिया का निधन हो चुका है।

हिंदू सांसद की ऐतिहासिक जीत
BNP के गायेश्वर चंद्र रॉय ढाका से 1971 के बाद पहले हिंदू सांसद बन सकते हैं — यह सामाजिक समावेशन का संकेत माना जा रहा है।
‘जुलाई चार्टर’ पर मुहर
दो सदन वाली संसद और PM के अधिकतम दो कार्यकाल जैसे सुधारों को जनसमर्थन मिला है।
संविधान संशोधन की ताकत
दो-तिहाई बहुमत के साथ BNP अब बड़े संवैधानिक बदलाव कर सकती है।
संयम की अपील
तारिक रहमान ने कार्यकर्ताओं से जश्न न मनाने और शांति बनाए रखने की अपील की है।
जनादेश स्वीकार
जमात प्रमुख डॉ. शफीकुर रहमान ने जनादेश का सम्मान करने की बात कही है।
अर्थव्यवस्था और भारत संबंधों पर नजर
नई सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती गारमेंट्स सेक्टर को फिर से पटरी पर लाना और कानून-व्यवस्था को मजबूत करना होगी। भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर भी कूटनीतिक हलचल तेज है। नई दिल्ली और ढाका के रिश्तों का अगला अध्याय काफी दिलचस्प हो सकता है।
ढाका की राजनीति में इस बार ‘नाव’ नहीं चली, बल्कि ‘लहर’ चल गई। अब देखना है कि ये लहर विकास की दिशा में जाती है या फिर गठबंधन की राजनीति में फंसती है।
गांव में घर बनाना हुआ आसान! अब नक्शे का झंझट खत्म
