
अमीनाबाद…लखनऊ का वो इलाका जहां शादी से लेकर जच्चा-बच्चा, कॉपी-किताब से लेकर कढ़ाई-कुर्ता, सब कुछ मिल जाता है।
यह बाजार नहीं, एक चलती-फिरती मॉल संस्कृति है—बस फर्क इतना है कि यहां एस्केलेटर नहीं, कोहनी चलती है।
ट्रैफिक नहीं, Human Tsunami है
यह कहना गलत होगा कि अमीनाबाद में ट्रैफिक की समस्या है। सच तो ये है कि यहां ट्रैफिक होता ही नहीं, क्योंकि सड़कों पर गाड़ियां नहीं—लोगों का सैलाब होता है।
सुबह 10 बजे से लेकर रात 10 बजे तक इलाके में रहने वाले लोग अपनी कार बाहर निकालने की सोच भी नहीं सकते। तो बाहर वाले ऐसे आएंगे।
यहां रोड नहीं, waiting room है… फर्क बस इतना कि टिकट किसी के पास नहीं।
लोकल Residents की मजबूरी: कार पार्क, लेकिन कब तक?
अमीनाबाद में रहने वाले कहते हैं, “कार हमने शो-रूम से निकाली थी, अब घर से नहीं निकल पा रही।” स्कूल टाइम हो या इमरजेंसी, बीमार बुज़ुर्ग हों या गर्भवती महिलाएं चार पहिया वाहन यहां सजावटी सामान बन चुके हैं।

दुकानदार खुश, लेकिन आधे मन से
दुकानदारों के लिए भी तस्वीर पूरी तरह गुलाबी नहीं है। हां, भीड़ है, ग्राहक हैं लेकिन माल लोड-अनलोड करना मुश्किल, दमकल या एम्बुलेंस आए तो रास्ता नहीं। दुकान के सामने ठेला, ठेले के सामने बाइक। बाजार चलता है, मगर मैनेजमेंट पैदल है।

प्रशासन कहां है? दिखता कम, सुनाई ज्यादा
ट्रैफिक पुलिस कभी दिख जाती है सीटी बजती है, हाथ उठते हैं… और फिर भीड़ वही रहती है। नो-एंट्री बोर्ड हैं, पर पढ़ने की फुर्सत नहीं। प्लान हैं, पर अमल गलियों में फंसा है।
अमीनाबाद में सिस्टम नहीं, सिस्टम एडजस्ट करता है।
समस्या क्या है और हल क्यों नहीं?
समस्या
- Narrow roads
- Unplanned encroachment
- Pedestrian + vehicle mix
हल
सबको पता है…लेकिन अमीनाबाद में हर समाधान अगली मीटिंग में अटका है।
अमीनाबाद बाजार लखनऊ की लाइफलाइन है। लेकिन यही लाइफलाइन अब ब्लड प्रेशर बढ़ा रही है। यहां ट्रैफिक जाम नहीं, जनभावनाओं का जाम है। जब तक प्लानिंग ground पर नहीं उतरेगी, अमीनाबाद यूं ही कहेगा “सब मिलेगा, रास्ता छोड़कर।”
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