
महाराष्ट्र की सियासत के लिए 28 जनवरी सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि एक झटका बनकर आया। प्लेन क्रैश में डिप्टी सीएम अजित पवार का निधन हुआ और देखते ही देखते सत्ता के गलियारों में शोक से ज़्यादा सियासी गणित तेज हो गया।
अजित पवार सिर्फ डिप्टी सीएम नहीं थे, बल्कि NCP (Ajit) के पावर-सेंटर भी थे। उनके जाने के साथ ही सवाल उठा—
अब वारिस कौन? सरकार में बैलेंस कौन संभालेगा?
सुनेत्रा पवार: चर्चा से शपथ तक, कुछ घंटों में
अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार, जो राज्यसभा सांसद हैं, उनका नाम चर्चाओं में आया और चर्चा से शपथ तक की दूरी कुछ ही घंटों में तय हो गई।
यही बात लोगों को चौंकाती है, क्या महाराष्ट्र सरकार एक डिप्टी सीएम के बिना कुछ घंटे भी नहीं चल सकती थी? या फिर वजह कुछ और थी?
गमगीन माहौल, लेकिन राजनीतिक urgency पूरी
31 जनवरी को सुनेत्रा पवार डिप्टी सीएम पद की शपथ लेने जा रही हैं, जबकि पति को गुजरे चार दिन भी पूरे नहीं हुए, परिवार अभी भी शोक की प्रक्रिया में है।
खुद सुनेत्रा पवार भी मानसिक रूप से इसके लिए तैयार नहीं मानी जा रही थीं, लेकिन राजनीति में भावनाओं की एक्सपायरी डेट बहुत छोटी होती है।
NCP Split की कहानी और विलय की आहट
अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से अलग होकर NCP (Ajit) बनाई थी और महायुति के साथ सरकार में शामिल हुए थे।
दूसरी ओर, शरद पवार की NCP महाविकास अघाड़ी में थी। लेकिन पर्दे के पीछे कहानी बदल रही थी— 8 फरवरी को दोनों NCP गुटों के विलय की घोषणा तय थी। जयंत पाटिल और शशिकांत शिंदे ने भी इसकी पुष्टि की।

यानि, NCP फिर से एक होने वाली थी।
BJP को क्यों लगा खतरा?
यहीं से बीजेपी की चिंता शुरू होती है। अगर दोनों NCP गुट मिल जाते sympathy wave चलती और पार्टी शरद पवार के कंट्रोल में जाती तो
BJP का NCP पर प्रभाव लगभग खत्म हो जाता। सरकार रहती, लेकिन कंट्रोल नहीं रहता।
पर्दे के पीछे खेल: सत्ता पहले, शोक बाद में
इसी डर के बीच BJP और NCP (Ajit) के बीच closed-door meetings शुरू हुईं समाधान निकला— सुनेत्रा पवार को डिप्टी सीएम बनाओ।
इससे NCP (Ajit) intact रहे, विलय पर ब्रेक लगे, BJP का grip बना रहे।
राजनीति ने एक बार फिर बता दिया, यहां कुर्सी कभी खाली नहीं छोड़ी जाती, चाहे माहौल कितना भी गमगीन क्यों न हो।
पवार परिवार में नाराज़गी की सुगबुगाहट
सूत्रों के मुताबिक, अजित पवार के अंतिम संस्कार के तुरंत बाद यह फैसला परिवार के कई सदस्यों को रास नहीं आया। पूरा पवार परिवार अस्थि विसर्जन तक साथ था, लेकिन सुनेत्रा पवार और उनके बेटे बिना किसी को बताए बारामती से निकल गए। राजनीति आगे बढ़ गई,
पर परिवार अभी भी पीछे छूट गया।
महाराष्ट्र में शोक की अवधि तय नहीं होती, यहां सिर्फ पावर वैक्यूम देखा जाता है।
