अब हजार सालों में नहीं सिर्फ 24 घंटे में बनेगा हीरा


हलो यू पी ( 28 - 04 - 2014 ) - हीरों के बारे में कहा जाता है कि वह जितने दिन धरती के अंदर रहे उतना ही कीमती होता है। हीरे कई हजार साल तक सालों तक धरती के अंदर रहकर बनते हैं। इन कीमती पत्थरों को उनके चमक और दुर्लभता के कारण जाना जाता है। लेकिन अब ऐसे लैब आ गए हैं जो धरती के नीचे हजारों साल में तैयार होने वाले हीरों को महज कुछ ही घंटों में तैयार कर देते हैं। इन लैब में ऐसे प्रेशर कूकर होते हैं जो हीरों को महज 24 घंटे के अंदर तैयार कर देते हैं। अब आप कोहिनूर के पाने के लिए अगले दिन का ऑर्डर दे सकते हैं। ऑर्टिफिशल हीरे नई बात नहीं हैं लेकिन लैब में बनने वाले हीरे निश्चित तौर पर एक नई बात हैं। इन हीरों ने जिस तरह से परिपूर्णता हासिल की है वह काबिलेतारीफ है। टॉप जूलर्स बॉडी का कहना है कि वह आखिरकार ऐसे हीरे बनाने में कामयाब हो गए हैं जो टॉप नैचरल हीरों की तरह हैं और इन हीरों को न ही आंखों से देखकर और न ही मैग्नीफाइंग लूप से ही नैचरल हीरों से अलग कहा जा सकता है। इसी बात ने कई जूलर्स को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे हीरे की बनने की नैचरल प्रक्रिया से इतर एक प्रॉक्सी प्रक्रिया अपनाएं। लैब में बने हीरे की कीमत 7 लाख रुपये प्रति कैरट होती है जबकि नैचरल हीरे की कीमत 15 लाख रुपये प्रति कैरट होती है। लैब में बने हीरे आंतरिक रूप से दोषहीन और बेहतरीन कलर-D- वाले होते हैं। साथ ही इनकी कटिंग भी बेहतरीन होती है। फॉक्स वैरियंट की कीमत 1 से 3 हजार रुपये ज्यादा होती है। फैक्टरी में बने हीरे पिछले साल के अंत में भारत पहुंचे। भारत में यह तेजी से बढ़ने वाला बिजनस है। 0.5 बिलियन कीमत वाले कंपनी लक्ष्मी डायमंड्स के अशोक गजेरा कहते हैं, हालांकि अभी ज्यादा लोगों को मानव निर्मित हीरों के बारे में पता नहीं है और कस्टमर्स को बेवकूफ बनाया जा सकता है। नाइन डैम के संजय शाह कहते हैं, मैं किसी को नई जूलरी के बदले पुरानी जूलरी को एक्सचेंच करने की सलाह नहीं दूंगा। इंडस्ट्री के एक्सपर्ट सलाह देते है कि कस्टमर्स को सभी जूलरी खरीद के लिए सर्टिफिकेट लेना चाहिए। फ्लोरिडा से सूरत तक ऐसी कंपनियां मशरूम की तरह बढ़ रही हैं। लैब में हीरों के निर्माण के लिए मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स में इन पत्थरों को उच्च तापमान पर विशेष यंत्रों के साथ रखा जाता है। इसके लिए दो तरीके अपनाए जाते हैं। पहला केमिकल वेपर डिपोजिशन (सीवीडी) और दूसरा हाई प्रेशर हाई टेंपरेचर (एचपीएचटी) तरीका। एक नैचरल छोटे हीरे को जोकि सीड की तरह काम करता है को एक कार्बन से भरे चैंबर में रखा जाता है और उस पर कई अन्य गैसे जैसे मीथेन को प्रवाहित किया जाता है। अगले 24 घंटे में गैसे जमा होती जाती हैं और हीरा लेयर दर लेयर और ऐटम दर ऐटम बढ़ता है, यह नैचरल तरीके से हीरा बनने की प्रक्रिया की तरह ही होता है।

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