आजाद ने आदिवासियों से सीखा था निशाना लगाना


हलो यू पी (29-07-2013) -  चंद्रशेखर आज़ाद का नाम भारत ही नहीं, दुनिया के महान क्रांतिकारियों में शुमार है। बचपन से ही अंग्रेजों के अत्याचार को देख कर इनका खून खौल उठता था। आगे चल कर ये हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन पार्टी के कमांडर-इन-चीफ़ बने। अमर शहीद भगत सिंह इन्हें अपना गुरु मानते थे। आज़ाद ने यह प्रण लिया था कि जीते-जी अंग्रेजों के हाथों में नहीं आएंगे और इन्होंने अपना यह प्रण निभाया भी। 

चंद्रशेखर आज़ाद की मां चाहती थीं कि वे संस्कृत के विद्वान बनें। उनके पिता ने संस्कृत शिक्षा के लिए उनका नामाकंन बनारस के काशी विद्यापीठ में करा दिया।

महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन से उनका मोहभंग हो गया। चौरी-चौरा कांड के बाद गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया था। इससे कांग्रेस के कई नेताओं में भी असंतोष था। आज़ाद का यह विश्वास दृढ़ होता चला गया कि अंग्रेजी शासन को हिंसक क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। उन्होंने निशानेबाजी का अभ्यास शुरू कर दिया। उन्होंने मध्यप्रदेश के झाबुआ में आदिवासियों से तीरंदाजी का भी प्रशिक्षण लिया। आज़ाद एक कुशल निशानेबाज थे। वे हमेशा अपने पास माउजर रखा करते थे।

आज़ाद 1925 में काकोरी रेल डकैती कांड से प्रसिद्ध हो गए। 1928 में सांडर्स हत्याकांड के बाद अंग्रेज उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगे थे।

साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पंजाब के क्रांतिकारी नेता लाला लाजपत राय की जब लाठियों से पिटाई की गई  और बाद में उनका निधन हो गया तो देश के युवा उबल उठे। इसी के बाद भगत सिंह ने आज़ाद से संपर्क बनाया। आज़ाद ने उन्हें और अन्य कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग दी। 

27 फरवरी, 1931 को आज़ाद जब इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में किसी से मिलने के इंतज़ार में बैठे थे तो किसी मुखबिर ने इसकी सूचना पुलिस को दे दी। पुलिस ने उन्हें चारो तरफ से घेर लिया। आज़ाद उन पर गोलियां चलाने लगे। जब उनके माउजर की गोलियां खत्म हो गई तो आख़िरी गोली उन्होंने ख़ुद को ही मार ली और यह प्रण पूरा किया कि जीते-जी अंग्रेजों के हाथ में नहीं आएंगे।



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